निवेदन।


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शुक्रवार, 7 अप्रैल 2023

3721. ....मैं क्या कह दूँ

 शुक्रवारीय अंक में

आप सभी का स्नेहिल अभिवादन
-------
बदलते मौसम
पेड़ का हाथ छोड़ते पत्ते
उदास दोपहर
ढलती शाम
दिन के बदलते रंग
हर पल याद दिलाती है
मैं यात्रा में हूँ...।

भीतर की बैचेनी
अकेलेपन का शोर
भीड़ का सन्नाटा
प्रेम की उदासीनता
रिश्तों की औपचारिकता
 ऊहापोह में डूबे मन को
चलते-चलते टोककर,
 रोककर कहते हैं
मैं यात्रा में हूँ।
#श्वेता

आइये आज की रचनाओं की दुनिया में चलते हैं-
विद्यां ददाति विनयं,
विनयाद् याति पात्रताम् ।
पात्रत्वात् धनमाप्नोति,
धनात् धर्मं ततः सुखम् ॥
उपर्युक्त श्लोक का अर्थ लिखने की आवश्यकता
 महसूस नहीं हुई हाँ ये जरूर महसूस हुआ कि
हर हाल में ज़मीन से जुड़े 
कुछ लोगों की आत्मा सच्चे प्रकाश से
जगमगाती रहती है-

खिसक न जाय जमीन कहीं पैरों के नीचे की
उड़ने न लगूं मैं कहीं हवा में
इसीलिये सम्मानों से
बचने की कोशिश करता हूं
फिर भी जब जबरन मिलता है
जी-जान लगाकर खुद को ज्यादा से ज्यादा
निर्मल करने लग जाता हूं


ब्रह्मांड के कण कण
में निहित अभिव्यक्ति
होठों से कानों तक सीमित नहीं,
अंतर्मन के विचारों के चिरस्थायी शोर में
मुखरित मौन व्याप्त है।

मैं क्या कह दूँ


स्वयं को ही
मनाने के...

आते हो जब मुझे
सौ बहाने !

रूठने के
टूट जाने के !

अपनी ही
गलियों में !

भटकता
फिर रहा हूँ
सदियों से...

माता और कन्या का रूप मानकर स्त्री का पूजन और बाकी लड़कियों एवं स्त्रियों के साथ दुर्व्यवहार ? ऐसा लगता है मानो स्त्री को देवी बनाकर स्त्री से अलग कर दिया! आख़िर ऐसा क्यों करना पड़ा? क्या इसलिये कि  स्त्री के लिये अपमान, हिंसा और उत्पीड़न के रास्ते खुले रखने थे जो उसे दासी बनाकर अपने नियंत्रण में रख सके और मनमना व्यवहार कर सकें।
परंतु जब कवि एक पुरूष हो जो स्त्रियों के हालात को समझकर उस
की पीड़ा उकेर रहा हो तो लगने लगता है कुछ
तो सकारात्मक बदलाव हो रहे हैं
सब की मानसिकता एक सी नहीं होती।



मैं भी तो रखती हूँ
सीने में एक मन ,
जो कि तुमसे ज्यादा
रखता है संवेदनाएं
समेटे हुए
भीतर अपने।  


हिन्दी पद्य-साहित्य विविध विधाओं का उपवन है। मुकरियों या कह-मुकरियोंका प्रारम्भ चौदहवीं सदी के प्रमुख कवि, 
शायर, गायक और संगीतकार अमीर खुसरो से माना जाता है। उसी परंपरा को आगे बढाते हुए आधुनिक हिंदी साहित्य के पितामह कहे जाने वालेभारतेन्दु हरिश्चन्द्रजी ने इस विधा को खुले हृदय से अपनाया एवं शृंगार रस के अतिरिक्त उन्होंने वर्त्तमान सामाजिक-राजनैतिक घटनाओं पर भी कह-मुकरियाँ लिख कर बेहतर प्रयोग किये थे।



ऐसी मीठी तान सुनावे 
कानों में मिस्री घुल  जावे 
मास जेठ का होवे सीत 
हरे अंब को बनावे पीत। 
का सखी, कोयल? 
न सखी, प्रीत! 



कुछ भी कर लीजिए लोग 
कमी निकाल ही लेंगे।
सभी हमसे खुश रह ही नहीं सकते
इसलिए दूसरों की बातें सुनकर दुखी होने
से अच्छा है अपने मन का सुने...।
बेहतरीन,सटीक बिल्कुल यथार्थ लघुकथा....

परन्तु आश्चर्यचकित थी सुन - सुनकर  कि "अब जो बनना था बन गई न !  फिर अब क्या पढ़ना ? ऐसे क्या किताबी कीड़ा बनी घुसी रहती है हर समय किताबों में ! ऐसे कैसे चलेगी इसकी जिंदगी ? बाहर निकल अब इन किताबों से , और सीख ले थोड़ा दुनियादारी ! अरे कुछ नहीं तो सो ही जाया कर थोड़ा ! दिमाग को चैन तो मिलेगा !


आज के लिए इतना ही

कल का विशेष अंक लेकर

आ रही हैं प्रिय विभा दी।




गुरुवार, 6 अप्रैल 2023

3720...जहाँ का दाना-पानी आपके नसीब में लिखा होता है...

शीर्षक पंक्ति: आदरणीया मीना भारद्वाज जी की रचना से। 

सादर अभिवादन।

आज हनुमान जयंती और विश्व स्वास्थ्य दिवस है, सभी को शुभकामनाएँ।

        राम जी की सेवा में पूर्णतः समर्पित हनुमान जी वैदिक साहित्य के अनूठे पात्र हैं। धार्मिक-साहित्यिक ग्रंथों में वर्णित हनुमान जी का चरित्र शौर्य, श्रद्धा,भक्ति और समर्पण का अनुपम उदाहरण है। हनुमान जी का संपूर्ण जीवन रहस्य और रोमांच से भरा हुआ है जो हमारे जीवन में ऊर्जा का संचार करता है।

    विश्व स्वास्थ्य संगठन की ओर से इस साल के लिए ध्येय वाक्य-"सबके लिए स्वास्थ्य" है। दरअसल स्वास्थ्य एक बुनियादी मानव अधिकार है जिसे बिना किसी आर्थिक बोझ के देश के सभी नागरिकों को उपलब्ध कराया जाना सरकार की जवाबदेही होती है। 'आयुष्मान भारत योजना' जो सितंबर 2018 से भारत में आरंभ हुई जिसका अब नाम बदलकर 'प्रधानमंत्री जन आरोग्य योजना' कर दिया गया है। इस योजना के तहत देश के अत्यंत ग़रीब परिवारों (सरकार का दावा है कि इस योजना से 10 करोड़ परिवार लाभांवित हो रहे हैं।) आयुष्मान कार्ड धारक परिवार के सदस्य कुल 5 लाख रुपये तक की स्वास्थ्य सेवाओं का लाभ सरकारी या निजी अस्पताल में सालभर में ले सकते हैं। बाक़ी जनता अब सरकारी अस्पतालों में उपलब्ध सेवाओं का दाम चुकाती है।आयुष्मान कार्ड धारक की पात्रत्ता के आधार पढ़कर आपका सर चकरा जाएगा क्योंकि एक शर्त यह भी है कि पात्र व्यक्ति (परिवार का /की मुखिया) के पास कच्चा मकान हो।

*****

इस बहस से बाहर आकर अब चलते हैं आज की पसंदीदा रचनाओं की ओर-

कहाँ जाएं किससे करे शिकायत

फिर मन न हुआ उसे  अपनाने का

जब मां ने कहा यह है खून का रिश्ता

तभी अपनाने का मन बनाया

फिर भी पहले जाना परखा तभी अपनाया।

कविता | अनुगूंज - डॉ (सुश्री) शरद सिंह

बूंदें छोटी

पर

अनुगूंज बहुत बड़ी...

कब भरेगी बाल्टी

कब थमेगी ध्वनि

पता नहीं

बचपन न छीने कोई--

कौन सिखाता है इन को जनम से जुर्म बाज़ी,
कच्ची उम्र ही में कर जाता है ज़िन्दगी तबाह,
 
ये कैसी  रहगुज़र है, जहाँ इंसानियत है शून्य,
बस नफ़रत ही नफ़रत है, चारों तरफ बेपनाह,

मृत्यु के बाद एक पल

उस पलजब होंठों पर बर्फ़ की सिल्ली रख जाय,

कहीं कुछ ऐसा तो नहीं;

जो वापसी का दरवाज़ा खोल दे.

उधार की आंखों से मैने उसे कांपते हुए देखा

लिफाफा मेरी उंगलियों से टकरा चुका था,

जन्मभूमि ॥ हाइबन ॥

कुछ इसी तरह के वाक़यों को  देखते सुनते वह समय भी आ ही गया जिसके बारे में अक्सर सुना है कि - “जहाँ का दाना-पानी  आपके नसीब में लिखा होता है वहाँ आपको जाना ही पड़ता है।

पूर्व और पश्चिम का अनूठा संगम लिए दिल्ली और जयपुर के बीच लगभग समान दूरी पर अवस्थित है पिलानी

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 

 

बुधवार, 5 अप्रैल 2023

3719..वो साँझ का पहर..

 ।।प्रातःवंदन।।


वाणी में ही जहर है, वाणी जीवनदान।
वाणी के गुण दोष का, सहज नहीं अनुमान॥
सहज नहीं अनुमान, कौन सी विपदा लाये।
जग में यश, धन, मान, मीत, सुख, राज दिलाये।
'ठकुरेला' कविराय, विविध विधि हो कल्याणी।
हो विवेक से युक्त, सरस, रसभीनी वाणी॥

~ त्रिलोक सिंह ठकुरेला
इसी संदेशप्रद उक्तियों के साथ आनंद उठायें आज की सम्मिलित रचनाओं से..


बड़ी चालबाज़ी से बेबसी का बहाना बनाकर 
ख़ुद से कर दिये बेगाना ईश्क़ में दीवाना बनाकर
इक बार मुड़कर देख लेते अश्क ग़र आँखों में बेवफ़ा

जाते ना छोड़ तन्हा मोहब्बत के शस्त्र का निशाना लगाकर ।

🔶

ऐतिहासिक ध्वंस और पुनर्निर्माण : (डॉ.) कविता वाचक्नवी

 2-3 सौ वर्ष पूर्व आई औद्यौगिक क्रान्ति के साथ पश्चिम में साईंस और रिलीजन दो हुए, और रिलीजन के फंदे से कुछ लोग बाहर निकले तथा कुछ आधुनिक होने लगे अन्यथा रिलीजन वालों का उस से पूर्व के लगभग 17-अठारह सौ वर्ष कितना भयंकर कुत्सित एवं..

🔶

मन - छाया


छायाओं से लड़कर कोई 

जीत सका है भला आजतक 

सारी कश्मकश 

छायाएँ ही तो हैं 

उनके परिणामों से बंधे..

🔶



नज़्म - - जीने का मज़ा



कुछ भी क़ायम कहाँ, ग़ैर यक़ीनी सूरतहाल, 

न फ़लक अपना, न ज़मीं अपनी, न ही

कोई बानफ़स चाहने वाला, बस 

दो पल के मरासिम, फिर 

तुम कहाँ और..

🔶


किसी के प्यार को क्या समझो

“कैसे लिखू कविता”

मुझे  छंदों का ज्ञान नहीं

ना ही मुझे मीटर का बोध

कभी बड़ी कमी लगती है

लेखन मैं  परिपक्वता नहीं

..

।।इति शम।।

धन्यवाद

पम्मी सिंह 'तृप्ति'..✍️

मंगलवार, 4 अप्रैल 2023

3718 ...वक़्त की साँकल से अटका इक दुपट्टा रह गया

 सादर अभिवादन

आज महावीर जयंती है

हर साल चैत्र माह के शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को महावीर जयंती मनाई जाती है। इस साल महावीर जयंती 04 अप्रैल को है। जैन धर्म के 24वें तीर्थंकर महावीर स्वामी का जन्म बिहार के कुंडा ग्राम में हुआ था। भगवान महावीर के बचपन का नाम वर्धमान था। कहा जाता है कि 30 वर्ष की आयु में इन्होंने राज महलों के सुख को त्याग कर सत्य की खोज में जंगलों की ओर चले गए। घने जंगलों में रहते हुए इन्होंने बारह वर्षों तक कठोर तपस्या की, जिसके बाद ऋजुबालुका नदी के तट पर साल वृक्ष के नीचे उन्हें कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति हुई थी। भगवान महावीर ने समाज के सुधार और लोगों के कल्याण के लिए उपदेश दिए।

अब देखें रचनाएं ...



कल मेरी बेटी ने विदेश से लौटते वक्त
मुझसे पूछा..माँ आपके लिए क्या लाऊँ तौहफ़ें में
मैंने कहा बस दो चार
मेपल ट्री की पत्तियाँ ले आना
चाहे सूखी ही क्यों न हो।
ये ज़िंदगी की हकीकत का आईना हैं।
सूखी पत्तियाँ अच्छी लगती हैं।




ब्याखुन्दा बगत भैर अंध्यारु ह्वैगे छौ, मोल्ला वळौंन लैट बत्ती बाळिल छै। मि पूजा बत्ती करि जनि थान बटि भैर बैठक मा आयी उनि मुबेलौ घ्वां-घ्वां, कुण-कुण, कुण। मिन हर्यूं बटन सरकायी ही छौ कि म्यार हेल्लो ब्वन सि पैली हैका तर्फां बटिन म्वटी गैरी बाज मा। हल्लोऽऽ....?



आंसुओं से तर-बतर मासूम कंधा रह गया,
वक़्त की साँकल से अटका इक दुपट्टा रह गया …

ज़िन्दगी वक़्त की रफ़्तार के साथ निरंतर चलती है पर कई बार कुछ ऐसे लम्हे आते हैं जो समय तो नहीं किंतु आपको रोक लेते हैं … मेरे जीवन में भी विगत कुछ हफ़्ते ऐसे बीते जिनकी चर्चा आप सब के साथ करना चाहता हूँ … विशेष कर उनके साथ जो हमारे जैसे अधेड़ हैं … (वैसे तो किसी भी आयु में ये हो सकता है) और इस बात पर ध्यान दे सकते हैं

 


तेरा- मेरा प्यार ज़िंदगी
मीठी- सी तकरार ज़िंदगी ।

खो बैठे धन अमर-प्रेम का
तब तो केवल हार ज़िंदगी




चले पिया जी सब्जी लाने, पाकर पत्नी से शिक्षा।
प्रिया ने जो था पाठ पढ़ाया,देने उसकी परीक्षा।

पत्नी जी की पसन्द की, वे सभी सब्जियाँं लाने।
हर सब्जी के दामों में,लगे दो-दो रुपए घटवाने।




तकलीफ सीने में ,
यूं दबाकर बैठे हो ,
कहते कुछ नहीं ,
बस रूठे और ऐंठे हो ,
किस बात का मसला है ,
कह दो तो जरा ,
मिलेगा सुकून मन को ,
ढहेगा उदासी का किला ।

आज के लिए बस
सादर

सोमवार, 3 अप्रैल 2023

3717......लेखन ने मुझे थामा इसलिए मैं लेखनी को थाम सकी

जय मां हाटेशवरी.....
आज जन्म-दिवस है.....
हिंदी की महान लेखिका मन्नू भडारी जी का.....
(जन्मः 03 अप्रैल,1931)        
कोटी-कोटी नमन आप की अमर लेखनी को.....

(यदि लेखन में ताकत है तो आप बिखर नहीं सकते।
लेखन ऐसी शक्ति है जो विपरीत  परिस्थिति में भी साथ देती है । लेखन ने मुझे थामा इसलिए मैं लेखनी को थाम सकी ।
बल्कि मैं तो कहती हूँ कि लेखन ही नहीं वरन अभिव्यिक्ति की कोई भी विधा चाहे वह संगीत हो या चित्रकारी , इनमें वह शक्ति होती है जो आपका वजूद बचाए रखती हैं।मैंने
अपनी पीड़ा किसी को नहीं बताई क्योंकि मेरा मानना है कि व्यक्ति में इतनी ताकत हमेशा होनी चाहिए कि अपने दुख, अपने संघर्षों से अकेले जूझ सकें। - मन्नू भंडारी

हे मानव मत मानवता छोडो
महामुनि का श्रेष्ठ वचन है 
हे मानव, मानवता को जोड़ो
अजेय है बल-शक्ति तुम्हारी
क्रोध -विध्वंस द्रोह को छोडो.
गिरा कहाँ ये समझ न आया
दया-धर्म मानव-संस्कार
व्यर्थ अभिमान में जीते लोग
छोड़ जाते सुख मोह के द्वार.

      

रात भर न बारिश हुई
घर हो
तो चार बेडरूम का हो
वरना वो घर ही क्या है
नौकरी हो
तो मैनेजर की
वरना वो नौकरी ही क्या है

अनदेखा फ़ासला - -
बिछी हैं खुली शतरंज की बिसात,
कहीं जीत है तो कहीं मात,
हर दौर में लेकिन 
पहले मरता 
है ग़रीब 
प्यादा,
पल की ख़बर नहीं, और वो करते 
हैं अंतहीन वादा - -

 

नारी उत्पीडन और धार्मिक आस्था">नारी उत्पीडन और धार्मिक आस्था
नारी उत्पीडन के मामलों में वृद्धि का एक अन्य कारण यह भी है कि आज की नारी शिक्षित तो अवश्य हुई है लेकिन साहस और दुस्साहस में अंतर करने की समझ उसमें विकसित
नहीं हुई है ! वह आधुनिक तो हुई है और हर क्षेत्र में पुरुषों को चुनौती देकर विजेता भी बनी है लेकिन इस मद में अपनी सीमाओं और मर्यादाओं का भी कई बार अतिक्रमण
कर जाती है और घात लगाए बैठे दरिंदों की कुत्सित मनोवृत्ति का शिकार हो जाती है !
संस्कार और नैतिकता का पाठ लोगों को घोल कर नहीं पिलाया जा सकता ! इसके लिए आज के युवाओं को आत्म चिंतन कर अपनी सोच को परिमार्जित करना होगा, अपनी जीवन शैली
और आदतों को बदलना होगा ! सुरुचिपूर्ण साहित्य से नाता जोड़ना होगा और पारिवारिक मूल्यों, नैतिक मूल्यों और धार्मिक मान्यताओं को सही अर्थ के साथ फिर से समझना
होगा तब ही कुछ बात बन सकेगी ! घर परिवार, शिक्षा संस्थान, एवं समाज के नीति नियंताओं को भी नए सिरे से पुनर्विचार कर ऐसी व्यवस्था को स्थापित करना होगा

राजनैतिक दोहे
बुरा जो देखन मैं चल्या, बुरा न मिलिया कोय ,
जांच कमीशन में यहां, कालिख, चूना होय ।।

आधुनिकता और नारी
ऐसा बदलाव यदि कोई अपने जीवन में अपनाता है तो उस में कोई बुराई नहीं है और ऐसे बहलावों को आधुनिकता का नाम देना सही भी है तो जब लोग इस  परिवर्तन को आधुनिक  
मान का स्वीकार करने के लिए उत्सुक हो सकते है  तो नारी के द्वारा अपने निजी जीवन में लाये  गये परिवर्तनों को भी लोगों को खुशी –खुशी अपना लेना चाहिए न की
यह सोच कर उस पर उँगली उठाते रहना चाहीये कि सारी आधुनिकता का प्रभाव केवल महिलाओं पर ही पड़ता है   नये अनुभवों के साथ सोच में परिवर्तन आना तो स्वाभाविक सी
बात है किन्तु उसका भी एक सीमित दायरा होता है लेकिन सोच में उस बदलाव का अर्थ, संस्कारों को भूल जान नहीं होता और यदि उस सोच को Broad minded होना कहा जाये
तो वो गलत नहीं होगा यह मेरा मत भी है और मेरा अपना अनुभव भी जय हिन्द ...

चलो एक कहानी लिखें ...संवेदनाओं को अपनी ज़ुबानी लिखें...
अक्षर की कटारों में
समय की धार लिखें।
छांव के नाम लिखें...
इज़हार-ए-मुहब्बत धूप का।
ज़रूरत आन पड़ी तो...
आग को आधार लिखें।
अपनी  ज़ुबानी लिखें।

धन्यवाद।    

रविवार, 2 अप्रैल 2023

3716 ..आनंदित है कण-कण जड़ का ..

 सादर नमस्कार

मास का द्वितीय दिन
भाई कुलदीप जी के गाँव में बारिश हो रही है
बिजली भी बंद है...डीजल भी नहीं आ सकता
इसीलिए जेनेरेटर भी बंद है..वहुत मुश्किल है
गाँव मे रहना.....खैर...
आज, कल और परसों बस हम और आप ही होंगे....
अब देखें रचनाएं ...

आनंदित है कण-कण जड़ का
चेतन इसमें छिपा हुआ है,
कुदरत का सौंदर्य अनूठा
मधुरिम लय में बँधा हुआ है


बातों में वही शब्द,
होठों पर वही मुस्कुराहट,
सब कुछ वही है,
फिर भी मुझे क्यों लगता है
कि हम वैसे नहीं रहे,
जैसे कभी हुआ करते थे?


रोटी सिर्फ रोटी नहीं
तपन सपनो की
मिठास प्यार की
कारीगरी हाथो की
उम्मीद ख्वाबो की

मद्धम ही सही जल तरंग सा
है ज़िन्दगी का साज़,
हज़ार ग़म लिए
सीने में, न
बदले
जीने का अंदाज़,


अब तो है सोचा कि खाएँगे धोखा जो
कुछ दिन और जीएँ
मान लेंगे उसी को अपना वो हमदम जो
कुछ देर साथ चले
शक़ और शुबहा साथ में मेरे
पल-पल साथ पले

"इक रोज़ उसने कहा था कि
"सबसे बुरा होता है,
प्रेम का इंतज़ार करना"...
प्रेम का स्वरूप समझना,
स्वयं में उतारना,
आत्मसात करना कठिन प्रतीत हो,
परंतु जब अंतस में उतरे,
समस्त आचार-विचार-व्यवहार
सबकी दिशा बदल जाती है..

आज के लिए बस
सादर
 

शनिवार, 1 अप्रैल 2023

3715... मूर्ख दिवस


 हाज़िर हूँ...! पुनः उपस्थिति दर्ज हो...

मूर्ख दिवस की शुरुआत साल 1381 से मानी जाती है. इंग्लैंड के राजा रिचर्ड द्वितीय और बोहेमिया की रानी एनी ने सगाई का ऐलान किया और कहा कि सगाई 32 मार्च 1381 को होगी। इस ऐलान से आम जनता इतनी खुश हुई कि उसने खुशियाँ मनाना शुरू कर दिया। हालांकि बाद में उन्हें एहसास हुआ कि वह बेवकूफ बन गए हैं क्योंकि कैलेंडर में तो 32 मार्च की तारीख ही नहीं आती। माना जाता है कि उसके बाद से ही हर साल एक अप्रैल को लोग Fool's Day के रूप में मनाने लगे।नकली नायकों को पर्दे पर दिखाकर

देवताओं की तरह उनका नाम जपायें।

बेकसूर रहें खौफ के साये में

कसूरवार जेल में भी जश्न मनायें।

सजाया है बाजार ने पर्दे पर खेल

उसमें आम इंसान अपनी नज़र गंवायें।

 
आज जग को है, पढ़े  लिखे से भी ज्यादा जरूरत मूर्खों की,
अगर ऐसा नहीं हुआ तो दोस्तों रूठ जायेंगे बसंत बहार
उन्हें मूर्ख बनाने में उसे कभी कोई विशेष मजा नहीं आया। आस-पड़ोस में भी किसी को बेवकूफ बनाया नहीं जा सकता, उसके घर की हर बात ही तो पड़ोसन जानती है। फिर क्या किया जा सकता है? किसी सरल स्वभाव वाले को छलने में ही आनंद आता है। सुबह वह नई ताजगी लिए हुए बिस्तर से उठी।
यूँ कब तक  ज़िन्दगी को,
गम्भीरता से जीते रहेंगे
इसे तो बेफिकरे बनके,
बिंदास बिताना चाहिए
हाँ अपनों से मूर्ख बनके
अप्रल फूल मनाना चाहिए

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पुनः भेंट होगी...
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