"फरवरी : वसन्त आ गया...वसन्त आ गया.. इश्क का मौसम आ गया...
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मुझे चम्पा से इश्क हुआ...,
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और आपको ?"
"सभी जगह ये मौसम इस बार इश्क़ ले कर नहीं आया।"
"ऐसा हो ही नहीं सकता..। शुरू हुआ इश्क कभी समाप्त नहीं हो सकता..।
मुझे बचपन से चम्पा से लगाव था, तब पागलपन समझने की उम्र नहीं थी। गुड़ियों से या घर-घर खेलना रुचिकर नहीं रहा। चम्पा के पेड़ के नीचे कंचा खेलना अच्छा लगता था। जब-तब अमरूद के पेड़ पर चढ़कर अमरूद खाना और चम्पा को निहारना अच्छा लगता। जब सन् 1994 में पटना निवास की तो बगीचा में चम्पा से पुनः भेंट हो गयी। कुछ सालों के बाद एक दिन पथ चौड़ीकरण में कट गया पेड़। रात को भोजन नहीं किया जा सका। लेकिन बहुत ज्यादा देर उदास रहने की मोहलत नहीं मिली। कुछ दिनों के बाद कटे ठूँठ बने मृतप्राय तने में से कोपल झाँक रहा था। "तुम्हारी उदासी मुझसे बर्दाश्त नहीं हो सकी। वृक्ष बनने का स्थान बनाओं..।"
सन् 2017 में हरिद्वार साहित्यिक सम्मेलन में उपहार स्वरूप चम्पारण के चम्पापुर से आया चम्पा का पौधा मिला। "तू जहाँ -जहाँ चलेगा, मेरा साया, साथ होगा.." एक ऋतु या कुछ पल का मोहताज नहीं हो सकता इश्क
अपना देश इतनी विविध संस्कृतियों वाला है कि यहाँ प्रदेश, महानगर, नगर, कस्बे, मोहल्लों की ही नहीं, एक मोहल्ले की हर गली की अपनी संस्कृति है दही ,पापड़ अचार,घी, चोखा वाली खिचड़ी जैसी, जिसका स्वाद और आनंद अविस्मरणीय होता है स्मृतियों में।
हाईटेक युग में बच्चों पर हावी होती जीवनशैली में गुम होती कहानियाँ,लोरियाँ और मासूमियत भरे बाल गीत का बच्चों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव पड़ा है जो उनके सर्वांगीण विकास में बाधक है। मुझे लगता है कि आज आपाधापी के इस दौर में बच्चों के कुंठा,निराशा और एकाकीपन में सकारात्मकता के रंग भरने के लिए बेहद आवश्यक है बाल साहित्य।
फरवरी का महीना मधुमास के नशीले रंगों में खड़ा मुस्कुरा रहा है मुट्ठियों में भरे प्रेम के गुलाल तनिक किनारे रखकर अपने मन के भ्रम दूर करने के लिए गहन अध्ययन से निकला निष्कर्ष पढ़ लीजिये न
वहीं भारत में इसका चलन 1992 के बाद बढ़ा। प्यार के जश्न का यह विशेष अवसर सप्ताह भर का उत्सव बन गया है जिसे वेलेंटाइन वीक कहा जाता है। यह वीक 7 फरवरी को रोज डे से शुरू होता है और 14 फरवरी को वैलेंटाइन डे के साथ समाप्त होता है। वेलेंटाइन डे सेलिब्रेशन भारत में 1992 तक नहीं होता था। यह आर्थिक उदारीकरण के अलावा टीवी विज्ञापनों और रेडियो कार्यक्रमों के जरिए फैला।
और चलते-चलते
कुछ लेखनी में सिर्फ़ स्याही नहीं भरी जाती है भरना होता है उसमें कोई ऐसी तीली जिसके घर्षण से उत्पन्न हुई चिंगारी सहसा चौंका दे ठंडी पड़ी हुई आत्मा को जोयूँ ही नहीं करती किसी
बातचीत के दौरान ही माधवजी सोनू को आवाज लगाते और उसके आने पर सबके सामने उसे एक दो रुपये का और एक पांच रुपये का सिक्का दिखला कर कोई एक उठाने को कहते थे ! जिस पर सोनू झट से दोनों सिक्कों में कुछ बड़ा दो रुपये का सिक्का ही उठाता था !