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आभार मनीषा
इन सुन्दर रचनाओं के लिए
सादर
दिन भर ब्लॉगों पर लिखी पढ़ी जा रही 5 श्रेष्ठ रचनाओं का संगम[5 लिंकों का आनंद] ब्लॉग पर आप का ह्रदयतल से स्वागत एवं अभिनन्दन...


लहरें जितनी तेजी से रेत पर लिखा नाम मिटा देती है, जो दिल के प्रतीक के अन्दर में लिखा होता है, उससे कम समय में दिल में बसा रिश्ता मिट रहा है... हर हाल में लाचार बेबस
धूप ,छाँव और मेहनत भरी जिंदगी की इस जंग में।
कहाँ साहिल मिला, जहाँ चैन का एक पल भी गुजारा है।
दे कुछ पल ऐ जिंदगी.... ,ठहराव के, आराम के मुझे।
मैं भी यह जान पाऊँ ,की जिंदगी का क्या इशारा है।
एक नाविक ,
तूफ़ान से उफनते दरिया को देख ,
मुस्कुरा उठा ..
उफान पर था दरिया ,
हवा तेज और तेज हो रही थी ,
अमरीकी साम्राज्यवाद निकृष्टतम राजनीति करते हुए भी दुनियाभर में 'अराजनैतिक होने' को एक 'वरेण्य मूल्य' के रूप में प्रस्तावित-प्रचारित करता रहता है, इस हक़ीक़त की गहराई में जाकर ग़लत राजनीति के खिलाफ़ और सही राजनीति के पक्ष में खड़ा होना होगा. दुविधाग्रस्त मन दुश्मन के काम को आसान बना देता है.
तुम दुनिया से अलग हो ,
यह सोच कर आंखों ने कुछ ख्वाब सजाए थे
मगर यह आंखें रो गई।
दादी कहती थी 4 दिन की चांदनी,
फिर अंधेरी रात
ये भी न सोचा
कैसे गुज़रेगी ज़िंदगी
बिना सोचे-समझे हर ख़ुशी
आपके नाम कर दी।
आप क्या करते हैं?
मैं दरख़्त लगाता हूं
हर रात एक नया दरख़्त
सुबह होने तक आसमान से जा लगता है
मेरा दरख़्त
शुक्रवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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सोचती हूँ,
श्वेत पन्नों को काले रंगना छोड़
फेंक कर कलम थामनी होगी मशाल
जलानी होगी आस की आग
जिसके प्रकाश में
मिटा सकूँ नाउम्मीदी और
आइये आज की रचनाएँ पढ़ते हैं-
किसी का क्या बिगाडा था, हुआ जो साथ ये मेरे
किया जो होम तो फिर, जला ये हाथ आखिर क्यों
किसी को मिल गया पैसा, किसी के पास शोहरते
मेरे दामन में ही कांटे, हजार आये है आखिर क्यों
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साहित्य का युवा वर्ग पर प्रभाव
यहां घास और तिनके को अलग करके भी
देखा जाए तो फूल,बच्चे और मन सबसे पहले कुचले जाते हैं तो फिर शेष क्या रह जाता है ? हो सकता है यही पंक्तियां यदि किसी महिला ने लिखी होतीं तो वह यहां एक शब्द और जोड़ देती वो होता "लड़कियां " और ये पंक्तियां और ज्यादा रूखी -कठिन हो जाती। जितना भी किशोरवय या बच्चे इस तरह के साहित्य को पढ़ेंगे उनकी भावनाएं बिना सोचे-समझे एक धारणा बना लेंगी जो किसी के लिए भी उचित नहीं होगा। जबकि ये भी सभी मानते होंगे कि फूल और मन पर तो ज्यादातर सारा का सारा काव्य साहित्य टिका हुआ है। बच्चों के साहित्य की भी कहीं कमी नहीं है बच्चों पर भी कविताएं पहले भी लिखी गई हैं आज भी लिखी जा रहीं हैं।
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आज के लिए इतना ही
कल का विशेष अंक लेकर आ रही हैं
प्रिय विभा दी।
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शीर्षक पंक्ति आदरणीया डॉ.जेन्नी शबनम जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
गुरुवारीय प्रस्तुति लेकर हाज़िर हूँ।
आज कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी है। भारतीय कैलेंडर में सभी माह 30 दिन के होते हैं। माह का पहला पक्ष (15 दिन) पंद्रहवें दिन (अमावस) को समाप्त होता है और माह का अंतिम दिन पूर्णिमा(अगले 15 दिन का अंतिम दिन) अर्थात वर्ष में कुल 360 दिन। जबकि अंतरराष्ट्रीय कैलेंडर के अनुसार साल में ३६५ दिन और हरेक चौथे वर्ष 366 दिन (फरवरी 29 दिन) क्योंकि यह पृथ्वी द्वारा सूर्य का एक चक्कर पूर्ण करने में लिया गया समय (365 दिन, 5 घंटे,59 मिनट और 16 सेकंड ) है। 365 दिन के अलावा ये अतिरिक्त घंटे, मिनट और सेकंड चार साल में जुड़कर एक दिन (24 घंटे) पूरे हो जाते हैं।
5X4=20 घंटे
59X4= 236 मिनट (236 = 3.933 घंटे / 3 घंटे और 56 मिनट)
16X4=64 सेकंड (1 मिनट 4 सेकंड)
कुल घंटे = 20+3=(23)
मिनट=56+1=57
सेकंड = 4
अर्थात पृथ्वी को सूर्य का एक चक्कर पूर्ण करने में 365 दिन के अलावा प्रति वर्ष जो अतिरिक्त समय लगता है वह चार वर्ष में 23 घंटे,57 मिनट और 4 सेकंड हो जाता है। यहाँ 3 मिनट, 56 सेकंड का समय 24 घंटे पूरे होने में कम है। सुविधा के लिए इस अतिरिक्त समय को एक दिन मान लिया गया और लीप ईयर में फरवरी माह को 29 दिन का घोषित कर दिया गया।
इस हिसाब से भारतीय कैलेंडर में हरेक साल 5 दिन 5 घंटे, 59 मिनट और 16 सेकंड का अतिरिक्त समय जुड़कर छठवें साल एक अतिरिक्त माह में तब्दील हो जाता है। आपने बुज़ुर्गों के मुख से सुना होगा कि इस साल तो दो सावन हैं।
बहरहाल इस पेचीदा हिसाब-किताब से बाहर आते हैं और पढ़ते हैं आज की पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
अपने और अपनों के लिए
अच्छी हूँ, तो हूँ।
मैं ख़ुशनसीब हूँ कि मेरे अपने हज़ारों हैं
उन्हीं के लिए शायद मैं इस जग में आई
बस उन्हीं के लिए मेरी यह सालगिरह है।
जाने कितने शब्द
स्मृतियों के घटनाओं
और पुराने जन्मों के
उपवन उगाना है तो
काटना होगा इस जंगल को
शून्य से ...
निर्वात में डूबी अभिव्यक्ति,
विराम चाहती है ।
विचार….,
मन आंगन के नीलगगन में,
खाली बादल से विचरते हैं ।
समता का ले भाव, जगत का दर्प मिटाता।।
पूरक बने समाज, मान के सब अधिकारी।
करके नित्य प्रयोग, अर्थ समझें आभारी।।
वक़्त
की
रहमत
से
वो
भर
भी
जाते
हैं।
शुक्र
अदा
करना
तो
बनता
है
इनका,
हम जंगल - नदियों से जितना पाते हैं।
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आज बस यहीं तक
फिर मिलेंगे अगले गुरुवार।
रवीन्द्र सिंह यादव