निवेदन।


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गुरुवार, 7 जून 2018

1056....सबने दूध चढ़ाया होगा तो मेरा एक लोटा जल ही सही.....

सादर अभिवादन। 
   कल विश्व पर्यावरण दिवस था। 
औपचारिक चर्चाओं के साथ ऐसे ही दिन गुज़र जाते हैं। 
लेकिन समाज में इस बिषय पर क्या मंथन हो रहा है इसकी झलक कुछ रचनाओं में अभिव्यक्त हुई है। 
पर्यावरण जैसा विशद बिषय केवल किसी सरकार के भरोसे नहीं छोड़ा जा सकता। विश्व बिरादरी इसे लेकर चिंतित है लेकिन 2015 में हुए ऐतिहासिक पेरिस जलवायु समझौते से अमेरिका के नये नेतृत्व ने अलग होने की घोषणा कर दी।  अब सुना है कि अमेरिका फिर इसमें सम्मिलित होना चाहता है।  पर्यावरण से जुड़ी ऐसी ख़बरें चिंताजनक हैं। पर्यावरण को लेकर धनी से लेकर ग़रीब देश के प्रत्येक नागरिक का दायित्व है कि वह अपना योगदान सुनिश्चित करे। बहरहाल पर्यावरण को लेकर शोर-शराबा बहुत है किंतु ज़मीन पर कार्य संतोषजनक नहीं हो रहे हैं।  
मेरे पिता जी एक कहानी सुनाया करते थे -
एक गाँव में सूखा पड़ा तो लोग बेहाल हो गये। 
इसी बीच एक महात्मा जी गाँव के शिव मंदिर में आकर रुके।  
गाँववालों ने अपनी व्यथा सुनाई और उबरने का उपाय पूछा। 
महात्मा जी बोले - "कल सूर्योदय से पूर्व आप सभी 
एक-एक लोटा दूध शिवलिंग पर चढ़ाएं, ईश्वर हमारी 
पुकार ज़रूर सुनेगा।" सुबह का उजाला होने से पूर्व ही 
लोग इस श्रद्धाजनक  कर्मकाण्ड में जुट गये। 
सवेरा होने पर अंतिम व्यक्ति को महात्मा जी ने जल चढ़ाते हुए देखा 
तो बोले - अरे ! यह क्या ? नीचे कुण्ड में भी जल ही एकत्र हुआ है, 
दूध की एक बूँद नहीं!  व्यक्ति दीनता से अपने दाँत दिखाते हुए बोला :
"महाराज मैंने सोचा, सबने  दूध चढ़ाया होगा तो 
मेरा एक लोटा जल ही सही।" लेकिन अँधेरे का 
लाभ उठाकर.......मिला क्या ? 

आइये अब आपको आज की पसंदीदा रचनाओं ओर ले चलें -      




क्या था सही ओर क्या गलत 
अब समझ पा रही हूं 
इसी दुःख का कर रही हूं निदान 
धरती से जन्मी थी 
फिर धरती में समा रही हूं |




शिकवा ग़मों का यूँ तो हर एक पल से है यहाँ
ख़ुश  भी  नहीं हुआ मगर ख़ुशी से आदमी

हासिल है रंजिशों का तबाही-ओ-तबाही
रहता है मगर फिर भी दुश्मनी से आदमी




कुदरत से खिलवाड दोस्तोंं
जीवन में मौत की बुलाहट
संतुलित रखो पर्यावरण को
वरना सुनो विनाश की मौन आहट




आओ हाथ से हाथ मिलाएं
धरा स्वर्ग है अपनी इसे वापस स्वर्ग ही बनाएं,
एक एक कर के भी अगर हम एक कदम बढ़ाएं,




स्मृतियों के आँगन में
जब भी ख्यालों की छुपन-छुपाई होती
कोई अपना पकड़ा जाता
लेते हुये हिचकी :)



मेरी फ़ोटो

चांद के दीदार का बहाना बना।
दोस्ती का कर्ज चुकाने आ गए ।।

सीढ़ियों पर भाग कर आते कदम ।
बीते दिन फिर से दिखाने आ गए ।।




पिता 🌲
वृक्ष की घनी छाँव सा 
दृढ़ता का आभास  !

पिता 🌲
अटल विश्वास सरीखा 
मन का शांत पड़ाव !

हम-क़दम के बाईसवें क़दम
का विषय...

आज बस यहीं तक..... 
मिलते हैं फिर अगले गुरूवार। 
कल आपके समक्ष होगी आदरणीया श्वेता सिन्हा जी की प्रस्तुति।  

बुधवार, 6 जून 2018

1055..अखबार होने का कर्तव्य निभा रहा है..


।।प्रात:वंदन।।

एक तरफ किसान दूध सब्जियाँ
फेंक रहे हैं
दूसरी ओर भूख से परेशान लोग..
सवाल तो ये भी है क्या गरीब किसान टैंकर से दूध बेचते है या ट्रक ,गाड़ी से सब्जी लाते हैं?
दोनों खबरे छप रही है..शायद वो अखबार होने का कर्तव्य निभा रहा हैऔर हम सभी
 सुबह- सुबह का समाचार..

अब नजर डालते हैं आज की लिंकों पर..✍

🔶🔷

बढ़ती उम्र में एक दूसरे पर निर्भरता को बयान करती आदरणीय दिग्म्बर नसवा जी की रचना..

नहीं जाता है ये इक बार आ कर
बुढ़ापा जाएगा साँसें छुड़ा कर
फकत इस बात पे सोई नहीं वो
अभी सो जायेगी मुझको सुला कर
तुम्हारे हाथ भी तो कांपते हैं
🔶🔷
ब्लॉग तिरछी नज़र से पढिए..
राजनीति-शास्त्र की कक्षा में अपने विद्यार्थियों को भारतीय लोकतंत्र की विशेषताएँ पढ़ाते 
समय गुरु जी उनको इतिहास की एक कथा सुनाने लगे –
‘बच्चों ! द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मनी ने फ़्रांस पर क़ब्ज़ा कर लिया था लेकिन फ़्रांसीसी 
अब भी छुप-छुप कर जर्मन सेना पर हमले कर रहे थे..

🔶🔷

संध्या राठौर प्रसाद जी की खूबसूरत रचना..



कितनी मुद्दतों से,
तक रही थी तेरा रास्ता
मन में कोई खुमार लिए

कि
आएगा तू
ले जाएगा तू..
🔶🔷

अरुण साथी जी की व्यंग्य...



चच्चा रामखेलावन परेशान होकर पूछने लगे। 
"आंय हो मर्दे ई वायरल की होबो हई!आझकल बुतरू सब बरोबर बोलो है!"
रामखेलावन चच्चा गांव के आदमी हैं। पुराने जमाने वाले। उनको क्या पता बेचारे को वायरल होना क्या है।
वायरल होना दरअसल नेक्स्ट जनरेशन का शब्द है। पता नहीं डिक्शनरी बनाने वालों ने इसे डिक्शनरी में स्थान दिया है या नहीं। दिया भी है तो इसकी परिभाषा क्या गढ़ी है। देख कर बताइएगा।..

🔶🔷
और अंत में   आदरणीय रवीन्द्र सिंह यादव जी की क्षणिकाओं के साथ गुजरते है..

बनते हैं महल 
सुन्दर सपनों के 
चुनकर 
उम्मीदों के 
नाज़ुक तिनके 
लाता है वक़्त 
बेरहम तूफ़ान 
जाते हैं बिखर 
तिनके-तिनके। 

🔶🔷
हम-क़दम के बाईसवें क़दम
का विषय...
...........यहाँ देखिए...........


🔶🔷
आज बस यहीं तक कल नई रचनाओं के साथ यहीं पर...
।।इति शम।।
धन्यवाद
पम्मी सिंह..✍

मंगलवार, 5 जून 2018

1054....कारण स्पष्ट है....... प्रकृति के साथ छेड़छाड़.....


जय मां हाटेशवरी....
स्वागत है आप सभी का......
सुन कर कुछ अजीब सा लगता है......
 हिमालय की गोद में बसे.....
शिमला में भी पानी के लिये मारामारी हो रही है.....
आंदोलन हो रहे हैं......
जाने जा रही है......
कारण स्पष्ट है.......
प्रकृति के साथ छेड़छाड़.....
 विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा प्रकृति को समर्पित दुनियाभर में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण और जीवन का अटूट संबंध है फिर भी हमें अलग से यह दिवस मनाकर पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन और विकास का संकल्प लेने की आवश्यकता है। यह बात चिंताजनक ही नहीं, शर्मनाक भी है। विश्व पर्यावरण दिवस संयुक्त राष्ट्र द्वारा सकारात्मक पर्यावरण कार्य हेतु दुनियाभर में मनाया जाने वाला सबसे बड़ा उत्सव है। पर्यावरण और जीवन का अन्योन्याश्रित संबंध है तथापि हमें अलग से यह दिवस मनाकर पर्यावरण के संरक्षण, संवर्धन और विकास का संकल्प लेने की आवश्यकता पड़ रही है।

यह चिंताजनक ही नहीं, शर्मनाक भी है। पर्यावरण प्रदूषण की समस्या पर सन् 1972 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने स्टाकहोम (स्वीडन) में विश्व भर के देशों का पहला पर्यावरण सम्मेलन आयोजित किया। इसमें 119 देशों ने भाग लिया और पहली बार एक ही पृथ्वी का सिद्धांत मान्य किया। इसी सम्मेलन में संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP)का
आगे पढ़े....
अब पेश है..... कुछ पढ़ी हुई रचनाएं.....

रेणुबाला
Image result for रूहानी प्यार के चित्र
रूहानी प्यार --------- कविता --
  बदल जायेंगे जब -
 सुहाने ये मन के मौसम ,
 तनहाइयों में साँझ की
 घुटने लगेगा दम - 
खुद को बहलायेंगें-
इसको निहार हम !!
  इस प्यार की क्षितिज पे
  रहेंगी टंकी कहानियां  ,




आँचल पाण्डेय

बहरुपी कलयुग
झूठ,लोभ और बैर कथा से
है इसके पाप का घड़ा भरा
पर डर मत तू ए बंदे तबतक
जबतक तू सच के साथ खड़ा
जो साथ निभाए दृढ़ता से सच का
भगवन का उसको साथ मिला





रश्मि शर्मा

पत्‍थर साहि‍ब और मैग्‍नेटि‍क हि‍ल का जादू
माना जाता है कि‍ गुरु नानक देव जी नेपाल, सि‍क्‍कि‍म और ति‍ब्‍बत होते हुए यारकंद के रास्‍ते लेह से यहाँ पहुँचे। सामने की पहाड़ी पर एक राक्षस रहता था जो यहाँ के लोगों को मारकर खा जाता था। गुरुजी लोगों की पुकार सुनकर इस स्‍थान पर पहुँचे और यहाँ नदी के कि‍नारे आसन लगाया। लोगों को राहत हुई

पंकज कुमार 'साहेब'

अपने हीं लोगों में कहीं खो गए हम
घायल, रोता हुआ गिड़गिड़ाता रहा
बचते हुए सड़क पार हो गए हम।।
भगवान की दुहाई सुनाई न पड़ी
मगर फ़िल्मी गानों पे रो गए हम।।


अरमान...
My photo
चलो आज लगाएं यादों का बाज़ार
बाज़ार ए इश्क़ में बड़ी चालबाज़ी है
छूके देखिए जनाब ये आज भी ताज़ी है

ले लो सस्ती हैं, नहीं क़ीमत ज़्यादा है
ताउम्र साथ रहेंगीं 'अरमान' का वादा है...



राधा तिवारी

तालमेल
 राहें भरी है फूल से ये कौन आ रहा।
लगता यही है आज तो दिलदार आ रहे।।
सड़कों पर तो दिखते थे इंसान रात-दिन।
रातों को अब घरों में तो सियार आ रहे ।।

मेरी धरोहर

उम्मीद-ए-वफ़ा की फितरत से शर्मिंदा हूँ मैं,
ग़ज़ब कि दगा के हादसों के बाद ज़िंदा हूँ मैं,
मुहब्बत से ऐतबार उठ गया अच्छे-अच्छों का,
शिकस्त से हौसले आज़माने वाला चुनिंदा हूँ मैं,

अब चलें
हम-क़दम के बाईसवें विषय की ओर..
इस सप्ताह का विषय है
"दहलीज़"
उदाहरण
"दहलीज़"
संस्कारों की भाषा
सभ्यता की दहलीज़ लांघने से पहले
हर शब्द के आगे
एक लक्ष्मण रेखा खींच देती है
...
संवाद मन का मन से
कभी मौन रहकर,
कभी आंखों की भाषा पढ़ती आँखे
बिना कुछ कहे
कितनी ही बातों को पहुँचाते
ये मन के तार इक दूजे तक
दूरियाँ ऐसे क्षणों में बेमानी हो जाती
- सीमा "सदा" सिंघल

रचनाएँ दिनांक 09 जून शाम पाँच बजे तक स्वाकार्य
प्रकाशन तिथिः 11 जून 2018...
सभी रचनाएँ ब्लॉग सम्पर्क प्रारूप पर ही भेजें
सादर
धन्यवाद।

सोमवार, 4 जून 2018

1053...हम-क़दम का इक्कीसवाँ अंक....

अँधा बेचे आईना, विधवा करे श्रृंगार
कथा कहे बहुरूपिया, ढोंगी पढ़े लिलार.

उपरोक्त दोहा था विषय आज का, हमने लिखा था...
रेखांकित शब्द ही मुख्य विषय है...
हमने कोशिश की पर...नहीं लिख पाए..
चलिए चलें आज के शब्दों के समूह की ओर
जिसका कुछ न कुछ अर्थ निकलता ही है
अर्थहीन तो कतई नहीं है.....

आज के विषय की जानकारी सिर्फ और सिर्फ हमें ही थी
आज के इस अंक में एक चर्चाकार की रचना भी शामिल है.
-0-

कोई दुनिया भर के श्रृंगार तले 
आइने को धोका देता है 
सब रंगो में रंग कर भी 
जाने किस रंग को रोता है 
कोई विधवा सा सब कुछ खो कर 
बिन रंगों के जीता है 

तुम्हारे अधरों से झरते
शब्दों को चुनती बटोरकर रखती जाती
खिड़की के पास लगे
तकिये के सिरहाने
एकांत के पलों के लिए
जब स्मृतियों के आईने से निकाल कर
तुम्हारी तस्वीर देखकर
नख से शिख तक निहारुँ खुद को
तुम्हारी बातों का करके श्रृंगार इतराऊँ

बहुरुपियों की फौज,
यहाँ करती है मौज !
जैसा मौका,जैसा वक्त,
वैसा रूप धर लेते हैं। 
कहे 'मीना' तू सँभल,
ऐसे आग पर ना चल,
यहाँ हंस मरे भूखा,
कागा मोती चुन लेते हैं !!!

माँग भरी सेंदूर से,
टिकुली धरी लिलार।
अंजन आँजा लाज का,
पूरा हुआ श्रृंगार ।।

आईना अँखियाँ हुईं,
प्रिय-प्रतिबिंब समाय ।
हृदय हुआ बहुरुपिया,
स्वांग हजार रचाय ।।


अंधा बेचे आईना विधवा करें शृंगार 
कथा कहे बहुरूपिया ढोंगी पढ़े  लिलार !

ढोंगी पढ़े लिलार सब करतब है भैय्या 
कलयुग में जो ना हो जाये कम है भैय्या !

गुरुजन शिक्षा बेचते ज्ञान ध्यान के बने बिकैय्या 
भगत ध्यान की आड़ मैं व्यभिचार की खेवे नैय्या !

वो कलमा पढते रहे अत्फ़ ओ भल मानसी का
उन के दिल की कालिख का हिसाब लेने आया हूं।

करते रहे उपचार  किस्मत ए दयार का 
उन अलीमगरों का लिलार बांचने आया हूं।

बावला है यह आइना
कुछ भी दिखाओ
उसी पर यकीन कर लेता है !
सब कहते हैं
आइना कभी झूठ नहीं बोलता,
आईने को कोई भी
बरगला नहीं सकता,  
उससे कुछ भी छिपाना असम्भव है ! 


क्या और कुछ बाकी रह गया है
मेरे श्रृंगार में जो तुम 
मेरे लिये ले आये हो !
मेरा सबसे अनमोल गहना तो तुम हो
तुम्हीं मेरी श्रृंगार हो
और तुम्हीं मेरेे अभीष्ट भी
तुम्हें पाकर मैं सम्पूर्ण हो चुकी हूँ
अब मुझे अन्य किसी श्रृंगार की
आवश्यकता नहीं !

आदरणीय आशा मौसी ने तीन शब्दों का प्रयोगकर
तीन रचनाएँ पढ़वा दी हमें...

दिन के उजाले में 
एक एक लकीर दीखती 
सत्य की गवाही देती 
अन्धकार में सब छुप जाता 
कुछ भी न दिखाई देता |


तो कभी काली माता बन जाता
क्या उसका कोई नाम नहीं
 कोई उसे क्या  काम नहीं ?
माँ ने समझाया है उसका यही काम
तरह तरह के स्वांग बनाना
और सब को हंसाना 
यही है उसकी कमाई का जरिया
कहते है उसे बहुरूपिया |


थी नादान बहुत अनजान 
जानती न थी क्या था उसमे 
सादगी ऐसी कि नज़र न हटे 
लगे श्रृंगार भी
फीका उसके सामने | 

ग्यारह कविताओं का यह अंक
सारी रचनाए हमारी सुविधानुसार हैं
हमारा बाईसवाँ विषय आपको मिलेगा
मंगलवार के अंक में
सादर
यशोदा












रविवार, 3 जून 2018

1052.....अच्छी भली आँखों के अंधों का कोई करे तो क्या करे

सादर अभिवादन
पूरे इतिहास में वर्ष के
हर दिन हर घण्टे में
कुछ न कुछ घटित होता है
और होते रहेगा...

पर गूगल जी महाराज के पास
आज का कोई रिकॉर्ड नहीं है...
यानि ..आज का दिन पाक साफ है

आज यदि आप कोई हंगामा करते हैं तो

आज का दिन  आपके नाम में दर्ज हो जाएगा....
.....शुरु करते हैं हंगामा.....


My photo
सब हिसाब मांगते हैं। 
और एक दिन ऐसा आता है,
जब जीवन हमसे हिसाब मांगता है । 
तुम्हें तो मैंने जीवन उपहार दिया था । 
तुमने उसे हिसाब-क़िताब कैसे समझ लिया ?
संसार ने तुम्हें बहुत कुछ दिया । 




पहाड़ों के ठाट भी बड़े निराले हैं
मरकत और सब्ज रंगों से सजे
अपनी ही धुन में मगन ।
कुदरत ने भी दोनों हाथों सेे
नेह की गागर इन पर
बड़े मन से छलकी है ।


My photo
आँखें जो खुली तो उन्हें अपने क़रीब पाया ना था
कभी थे रूह में शामिल आज उनका साया ना था

बेपनाह मोहब्बत की जिनसे  उम्मीदें लिये बैठे थे
उनसे तन्हाइयों की सौगातें मिलेंगी बताया ना था

इतना  ही नही आता समझ
अगर  गया बदल तो क्यों
याद  आज वो गलियारे…..
आओ कुछ  निहारे अतीत के गर्त  में , 
शायद खो सकूँ गलियारों में…..

ख्याल.... प्रियंका श्री
तबाह कर चले है
वो जिंदगी अपनी,
किसी खुदगर्ज़ ,
इंसान के लिए।

तेरी निगाहें.... आशा सक्सेना
ऐसी आकर्षक निगाहें तेरी
यदि पड़ गईं किसी पर
देखते ही प्यार हो जाएगा
यदि भूल से भी वह इनसे
बच  कर निकल गया
दिन पूरा उसका खराब जायगा

उलूक टाईम्स.... डॉ. सुशील जी जोशी

अब देख कर
भी नीम की
हरियाली से
कढ़वाहट
आ रही है
कहे कोई
तो कोई
क्या कहे
और क्या करे
दें इज़ाज़त
दिग्विजय को
सादर










शनिवार, 2 जून 2018

1051... हाय रे गर्मी



Image result for गर्मी पर छोटी कविता

सभी को यथायोग्य
प्रणामाशीष

दो जून की मगजमारी
उपजा मगरूर तामस 
बंजर भावों पर मलने


खेतों में मजूरी से भरे पूरे परिवार का
पूरा नहीं पड़े है ज़माना महँगी मार का
इसलिए छोड़ के बसेरा चले जाते हैं
भूमिहीन उठा डाँडी-डेरा चले जाते हैं
चुग्गे हेतु जैसे खग नीड़ छोड़ जाते हैं

Image result for गर्मी पर छोटी कविता


होड़ मच गयी
हर कोई अपने सुख के लिए
अपना काँटा निकालने के लिए खङा था
उनकी पर्ची पर किसी न किसी का नाम था
क्या दोस्त,क्या भाई
ससुर हो या जमाई

Image result for गर्मी पर हास्य कविता

सुबह में उठना, ब्रश ना करना, बस शुरू कर देना वीडियो गेम
साथ में गिलास हो गरम दूध का, और ब्रेड हो जिस पर लगा हो जैम
बस फिर कोई ना रोके, कोई ना टोके, हम आभासी वीरों को
दुनिया को हमें बचाना है, झुलसा के दुश्मन के जज़ीरों को…
पर ऐन-वक़्त पे बिजली के जाने से गुस्सा आता है
और दुसरे ही पल में हमको एक जोश नया मिल जाता है



ये आंच ये ताप कब होगा समाप्त
झुलसती ये गरमी बरस रही है आग
धूप के कहर ने तो ले ली कई जानें
निकलना हुआ मुश्किल सोचें है कई बहाने




कूलर ए.सी. के फेर मेँ खाता बचा ना कोय ।।
बाट ना देखिए ए.सी. की चला लीजिए फैन
चार दिनोँ की बात है फिर आगे सब चैन ।।
पँखा झेलत रात गयी आयी ना लेकिन लाईट
मच्छर गाते रहे कान मेँ तक तना तंदूरी नाईट


फिर मिलेंगे...
हम-क़दम 
सभी के लिए एक खुला मंच
आपका हम-क़दम इक्कीसवें क़दम की ओर
इस सप्ताह का विषय है
दो पंक्तियाँ है
यानी एक दोहा है

अँधा बेचे आईना, विधवा करे श्रृंगार
कथा कहे बहुरूपिया, ढोंगी पढ़े लिलार.

और इसका कोई उदाहरण मौजूद नही है
रेखांकित शब्द ही विषय है
उपरोक्त विषयों पर आप सबको अपने ढंग से 
पूरी कविता लिखने की आज़ादी है

आप अपनी रचना आज शनिवार 02 जून 2018 
शाम 5 बजे तक भेज सकते हैं।
चुनी गयी श्रेष्ठ रचनाऐं आगामी सोमवारीय अंक
04 जून 2018  को प्रकाशित की जाएगी । 
रचनाएँ  पाँच लिंकों का आनन्द ब्लॉग के 
सम्पर्क प्रारूप द्वारा प्रेषित करें

शुक्रवार, 1 जून 2018

1050..मन में लिए, कुछ अनकही सी बात

प्रत्येक  माता-पिता अपने बच्चों के उज्जवल भविष्य को लेकर सदैव चिंतित रहते हैं। 
सीबीएसई बोर्ड की दसवीं और बारहवीं का परीक्षा का परिणाम घोषित हो चुका है। कुछ बच्चों ने 
रिकॉर्ड बनाते हुये 98℅ - 99℅ तक नं लेकर आये हैं, सभी को जीवन में सफलता के 
महत्वपूर्ण सोपान पर चढ़ने  की  हार्दिक शुभकामनाएँ, 
पर जिन बच्चों का परसेंटज मनोनुकूल नहीं आया हैंं , उनके माता-पिता और रिश्तेदारों से विनती है 
कि दूसरों के बच्चों से  अपने बच्चों का तुलनात्मक विश्लेषण कृपया न करें।उनकी कोमल मनोदशा 
को समझते हुये उनका सहारा बने उन्हें सकारात्मक रहने को प्रेरित करें।
नंबर की दौड़ में पिछड़ते बच्चों की कुंठा के लिए जिम्मेदार हमारी शिक्षा-प्रणाली में बदलाव 
की उम्मीद करना व्यर्थ है। पर आप पर निर्भर, हर बात पर आपका मुँह जोहते आपके 
बच्चों पर अपने अधूरे सपनों का बोझ न डालें।
रट्टू तोता बनते बच्चे,विषय संबंधी ज्ञान और भारी-भरकम सिलेबस में इस कदर उलझ जाते है 
कि उनका मानसिक विकास सिकुड़ कर रह जाता है।
प्रतिस्पर्धा के इस दौर में अपने बच्चों को ज़िंदगी में सकारात्मक रहकर कपनी क्षमता के 
अनुरुप क्रियाशीलता को बढ़ावा देकर हम उनका भविष्य गढ़ने में सहयोग कर सकते हैं।

सादर नमस्कार

चलते है आपके द्वारा सृजित रचनात्मकता के संसार में-

आदरणीय विश्वमोहन जी की लिखी अद्भुत रचना
भोर भोरैया....
हूक उठे छतिया, मसक गयी अंगिया
कसक कसक उठे, चिहुँके चिरैया

भोर भोरैया, रोये रे चिरैया
बीत गयी रैना, आये न सैंया

आदरणीया मालती जी की रचना
लेखनी स्तब्ध है
भावों का आवागमन
दिग्भ्रमित करने लगा
शब्दों के मायाजाल में
सहज मन उलझने लगा।
बढ़ गईं खामोशियाँ
जो अंतर को उकसाने लगीं

आदरणीया रेणु जी की हृदयस्पर्शी कहानी
जिद

गाँव भर में  तुम्हारे  चाल-चलन  के बिगड़ने की अफवाहे फैलती रहती थी पर तुम्हारी माँ हमेशा कहती  की तुम निर्दोष हो  | उसे हमेशा लगता रहा ,कि तुम सरल हो इस लिए अपना भला  बुरा समझ नहीं पाते | वह कहती -तुम्हे   तुम्हारे   शरारती दोस्तों के साथ खड़े होने   की सजा मिलती  है | 


🔷💠🔷

आदरणीया इन्दिरा जी की रचना
साँझ ढले

साँझ अकेली 
बैठी बैठी 
सोच रही एक ही बात 
कौन दे गया 
जाते जाते 

जीवन भर का ये अवसाद !

🔷💠🔷

आदरणीय पुरुषोत्तम जी की रचना
चराग


यूँ धू-धू कर जले, चरागों के ख्वाब,
ज्यूं चिंता में, भस्म हुए हों मरने के बाद,
मन में लिए, कुछ अनकही सी बात,
चिताओं सी दहकती, वो जलती सी रात,

बंद पलकों तले, ढ़ल गई वो भी साथ....

🔷💠🔷

और चलते-चलते आदरणीया अनीता  की लेखनी से
क्या कहूँ
मेरी फ़ोटो
क्यो अमावस्या सी ,लगे ज़िंदगी..!
हर रात स्याह ,अंधेरी है।
तुम्हारे लिहाफ में ,छुपी नींदें
क्यो मेरी आंखें रतजगी वीरानी है
क्यो अमावस्या सी ,लगे ज़िंदगी..!
हर रात स्याह ,अंधेरी है।
तुम्हारे लिहाफ में ,छुपी नींदें

क्यो मेरी आंखें रतजगी वीरानी है

नया विषय
हम-क़दम का
यहाँ देखिए


आपके द्वारा सृजित रचनाओं का संसार कैसा लगा
आपकी बहुमूल्य प्रतिक्रियाओं की प्रतीक्षा में



श्वेता सिन्हा


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