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गुरुवार, 22 अक्टूबर 2026

4902 ..एक अधूरी आशा बार-बार देती थी दुःख

 सादर अभिवादन


दीपमालिका 
पर्व को बस कुछ ही दिन शेष

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वापसी मद्रास-निजामुद्दीन राजधानी एक्सप्रेस से थी ! सुबह जब वेंडर चाय लाया तो उसके साथ भी वही दो डाइजेस्टिव बिस्कुट फिर किसी साये की तरह मेरे सामने उपस्थित थे ! लगने लगा था कि एक तरह से मिडास हो गया हूँ, जिस बिस्कुट को छूता हूँ वही ''वह'' बन जाता है ! समझ नहीं आ रहा था कि रोऊं या उस बिस्कुटिया आत्मा से माफी मांगू .




ढलते-ढलते शाम रात के काँधों से आ लगी थी। रात के कांधे से टिकी शाम देखी है कभी? वो भी मौसम की उस दहलीज़ पर जब एक मौसम ने विदा ली न हो और दूसरे मौसम की आमद घुंघरुओं सी बज उठी है। नवेली दुल्हन सी वो शाम बस रात में घुल जाने को आतुर। कुछ रातें अपने भीतर ढेर सारा उजास सहेजे होती हैं। यह उजास चाँद के आने-जाने के हिसाब से परे होता है। कल की रात भी ऐसी ही उजास भरी रात थी। ज़र्रर्रर्र से गुज़रते दिन का हाथ थाम शाम ने ऋषिकेश के रास्ते पर रख दिया था। सदा का प्यारा ऋषिकेश। 





मीडिया में
बहस छिड़ गई—

ख़ास लोगों के लिए
आरक्षित साँसों की
तस्करी में
किन लोगों का हाथ है?





जो बस में होता मेरे,
मैं लिख देता तुम्हारे...
आसमान में सिर्फ सवेरे 
मैं  लिख देता तुम्हारी...
किस्मत में रौशनी के फेरे




विराज गए 
राम तो कब के, 
प्रासाद में अपने।
चौकीदारी  करने 
अपनी चढ़ौती की!

रेंगते तिलचट्टों और 
भिनभिनाती मक्खियों 
के इस आवर्त्त में।
मचाएंगे धूम
संततियों संग अपनी, 
अब भी कृतिकर ही,
कलियुग के!




एक अधूरी आशा 
बार-बार देती थी 
दुःख उन्हीं से मन रखता था उम्मीद 
जो शायरी की तरह नहीं जानते थे 
कि 'उम्मीद-ए-वफ़ा' क्या है! 



सादर समर्पित
वंदन

4 टिप्‍पणियां:

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