---

▼

बुधवार, 30 सितंबर 2026

4880..क्या लिखा जाए..

।।प्रातःवंदन।।

 "शब्द

मालूम है

व्यर्थ नहीं जाते हैं

पहले मैं सोचता था

उत्तर यदि नहीं मिले

तो फिर क्या लिखा जाए

किन्तु मेरे अन्तर निवासी ने मुझसे कहा-

लिखा कर

तेरा आत्मविश्लेषण क्या जाने कभी तुझे

एक साथ सत्य शिव सुन्दर को दिखा जाए

अब मैं लिखा करता हूँ

अपने अन्तर की अनुभूति बिना रँगे चुने

कागज पर बस उतार देता हूँ।"

त्रिलोचन 

बुधवारिय प्रस्तुतीकरण के क्रम को बढाते हुए आज इन लिंको पर पड़ी ..जो इस प्रकार से है

मौन

बहला रहे हैं सब यहाँ, अब कौन है अपना 

कहने को हैं सदाएँ संग, बस मौन है अपना..

✨️

नाम...

तुम्हारा नाम याद करने की कोशिश कर रही हूँ

जाने किस नाम से पुकारती थी तुम्हें उन दिनों…

चेहरा एकदम साफ़ उतर आता है आँखों के आगे

जैसे सामने देख रही हूँ कोई..

✨️

असली कला

 वे कहते है कि लोगों को हँसाना एक कला है | 

मैं कहता हूँ कि वे लोग जो हँसते है दुनिया के सामने 

उन्हें अपने कंधे पर सर रखकर रो लेने देना असली कला

✨️

बस, यूँ ही थामे रहना।

हवा की बरजोरी,

शाखा का सिहरना।

टहनी की गलबाँही,

पलक मिलमिलाना

✨️

।।इति शम।।

धन्यवाद 

पम्मी सिंह ' तृप्ति '...✍️

5 टिप्‍पणियां:

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

आपकी टिप्पणियाँ एवं प्रतिक्रियाएँ हमारा उत्साह बढाती हैं और हमें बेहतर होने में मदद करती हैं !! आप से निवेदन है आप टिप्पणियों द्वारा दैनिक प्रस्तुति पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

टिप्पणीकारों से निवेदन

1. आज के प्रस्तुत अंक में पांचों रचनाएं आप को कैसी लगी? संबंधित ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर भी रचनाकारों का मनोबल बढ़ाएं।
2. टिप्पणियां केवल प्रस्तुति पर या लिंक की गयी रचनाओं पर ही दें। सभ्य भाषा का प्रयोग करें . किसी की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा का प्रयोग न करें।
३. प्रस्तुति पर अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .
4. लिंक की गयी रचनाओं के विचार, रचनाकार के व्यक्तिगत विचार है, ये आवश्यक नहीं कि चर्चाकार, प्रबंधक या संचालक भी इस से सहमत हो।
प्रस्तुति पर आपकी अनुमोल समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक आभार।