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मंगलवार, 28 जुलाई 2026

4817..... मुझसे बिछड़कर जाने वाला...

 मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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​मर्यादा के सारे तटबंध
तोड़ दिए इस शोर ने,
सभ्यता का सुंदर वस्त्र
चीर दिया इस दौर ने।
​गाली जब बनी 'कूल' होने का पैमाना,
तब भाषा ने धीरे से दम तोड़ दिया।
हमने अपनी ही संस्कृति का चेतना-पुंज,
अपने ही हाथों से फोड़ दिया।
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आज की रचनाऍं- 


थोड़ी देर स्वयं के संग भी, बैठ सकूँ तो बात बने,

मन के सूने आँगन में फिर, कोई चुप-सी भोर तने।

साँस-साँस जग को सौंप दी, अपने लिए जिया नहीं,

भीतर बैठा जो मैं था, उससे कभी मिला नहीं




गन्ध पुष्पों के 
बिना अब 
देवता पर क्या चढ़े?
शोक में 
डूबा हुआ मन 
मंत्र वैदिक क्या पढ़े?
तैर भी 
सकता नहीं 
गहरे भंवर के कूल हैं.


दिल की गहराई में 

जीवन का इक अंश छिपा है, 

श्रम के कटु प्रयत्न से मिलता 

स्नेहिल मृदु आँच में पका है ! 


दिल की गहराई में दीपक 

बिन बाती बिन तेल जल रहा,

श्वासों में अहर्निशा जैसे 

सहज मंत्र अनवरत चल रहा !



उसकी गली से रोज गुजरना 
शायद हो दीदार किसी दिन 

साक़ी का भी पूरा होगा 
सपनों का संसार किसी दिन 

मुझ से बिछड़कर जाने वाला 
लौटेगा इक बार किसी दिन 



एक दिन की बात है। वह जंगल में शिकार करने गया। काफी प्रयास के बाद भी उसके हाथ कोई शिकार नहीं लगा। वह काफी परेशान हो गया। अब वह थक भी गया था। तभी उसकी निगाह एक पेड़ पर पड़ी। उस पेड़ की डाल पर एक पक्षी बैठा था। उसने चुपके से जाकर पक्षी को पकड़ लिया। शिकारी पक्षी को लेकर जंगल के बाहर आया, तो उसने देखा कि एक हिरन सोया हुआ है





अभी जो कुछ पिछले दिनों दिल्ली में हुआ जहां बेकाबू-निरंकुश-पाशविक भीड़ ने दरिंदगी की हद पार कर दी, जहां महिला पुलिस कर्मियों तक को नहीं बक्शा गया ! जहां सुरक्षाकर्मियों की जान पर बन आई ! जहां धक्का-मुक्की, हाथा-पाई, गाली-गलौच, बेइज्जती की सारी सीमाएं लांघ दी गईं ! वहीं माहौल को संभालने में जिस धैर्य, जिस संयम, जिस परिपक्वता का उदाहरण दिल्ली की पुलिस ने दिया वह दुनिया में शायद ही कहीं देखने को मिले ! 


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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. ​मर्यादा के सारे तटबंध
    तोड़ दिए इस शोर ने,
    बेहतरीन अंक
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. सूर्य का पर्याय दीपक जब बुझने लगता है तब बहुत तेज रौशनी करता है- उस उदाहरण से मुझे निजी तौर पर लगता है कि किसी चीज का अन्त पराकाष्ठा पर होने से लगता है-
    समाज में व्याप्त गाली पर अक्सर उँगलिया उठाई जाती रही लेकिन गाली देने वालों की कभी कमी नहीं हुई -अब शायद हो जाए-

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात! बहुत कुछ सोचने पर विवश करने वाली रचनाओं से सजा अंक, 'मन पाये विश्राम जहाँ' को शामिल करने के लिए बहुत बहुत आभार श्वेता जी !

    जवाब देंहटाएं
  4. समसामयिक , सुन्दर, भावपूर्ण रचनाओं से सज्जित बहुत सुन्दर अंक। हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ !

    जवाब देंहटाएं

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