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शुक्रवार, 17 जुलाई 2026

4806 ..तुमको ढूँढे जब भी मेरा मन, पास सदा ही पाता है।

 सादर अभिवादन 


कल वर्षगाँठ मना लिए
तेरहवें वर्ष की ओर का
एक नया कदम 


मेरी पसंदीदा रचनाएं



 तुमको ढूँढे जब भी मेरा मन,
पास सदा ही पाता है।
इधर-उधर नजर घुमाती मैं,
संग तुम्हारा भाता है।
​तुम हो मेरे अंदर-बाहर,
तुमसे एक गहरा नाता है।





रेत के घर
ढह
जाते हैं लहरों को उसकी ख़बर नहीं होती,
जी उठते हैं फिर भी आदिम जीवाश्म
सभी सुबह की दस्तक से, इस
रात की कोई अंतिम डगर
नहीं होती, गुज़र जाते
हैं




हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है ! अभी कुछ दिनों से दुनिया के शायद सबसे घृणित जीव के नाम पर एक तथाकथित आंदोलन चलाने की असफल कोशिश की जा रही है ! आश्चर्य होता है ऐसी मानसिकता पर ! संसार का ऐसा कौन सा माँ-बाप होगा जो अपने बच्चों को कॉकरोच के रूप और रंग-ढंग में देखना चाहेगा ! क्या इस मुहीम के आयोजकों ने अपने बच्चों का नाम स्कूलों में कॉकरोच लिखवाया है ? यदि नहीं, तो क्यों नहीं............??  
    





देह, श्वास, मन तीनों मिलकर 
 देवालय ह्रदय में बनाते 
शुद्ध हुए वे निज प्रयत्न से 
आत्मा को उसमें बैठाते !




समुद्री घास  को आराम मिलता है,
 वह फिर से पनपती है
समुद्र की तलहटी किसी नियॉन रोशनी वाली दावत जैसी लगती है।
एल्कहॉर्न कोरल खिल उठते हैं, 
कछुए धीरे धीरे आ जाते हैं किनारों के पास।




वर्णांधता या रंग अंधापन
परिभाषित करना
आज जब बहुत ही आसान है
समझ में आए रंग भी
और दिखे इंद्रधनुष रक्त में
साधू फिर क्यों परेशान है


सादर समर्पित
सादर वंदन

4 टिप्‍पणियां:

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