---

मंगलवार, 16 जून 2026

4775....कुछ शब्दों में चंदन महके...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
--------
कोयल की मीठी तान और पुरवाई की गुनगुनाहट के साथ क्षितिज  पर लाल,पीले,सुनहरे छींटों के साथ सूरज का उगना, गरम थपेड़ों से परेशान दिन का अलसाना, धूप के कर्फ्यू में दोपहरीभर सोना, शाम को छतों पर चाँद का बादलों के साथ लुका-छिपी निहारना,चमकीले फीके तारों को गिनना, बेली और रातरानी की महक को फ़िज़ाओं में महसूस करना,विभिन्न प्रकार के आम की भीनी खुशबू, ठंडी लस्सी,कुल्फी,आइस्क्रीम,नींबू पानी की लज़्जत, आँधियों और हवाओं के साथ उड़ते बादलों के साथ  बारिश का इंतज़ार करना,
कौन कहता है गर्मियाँ खूबसूरत नहीं होती?


पर सच्चाई तो ये है न......
पर्यावरण के असंतुलन से बिगड़ता तापमान,तेजी से सूखते पीने के पानी के सोते, बीमारियों का बढ़ता प्रकोप, असहनीय,जर्जर लाइट की अव्यस्था से छटपटाते ए.सी,फ्रिज, कूलर और पंखें के उपभोक्ता। पसीने से तरबतर, बार-बार सूखे होंठों पर जीभ फेरते लोग, सच ये गर्मियाँ 
कितनी बुरी होती है न?

अब तो गर्मी हर मौसम के पृष्ठभूमि में होने लगी है। ठंड कम हो तो गरमी,बारिश ठीक से न हो तो गरमी। मतलब स्थायी ऋतु गरमी है 
बाकी मौसम का आना-जाना लगा हुआ है। 

आपने सोचा नहीं था न?....
पर इस असंतुलन के लिए हम ही जिम्मेदार है,
सुविधायुक्त जीवन जीने की लालसा में।


आज की रचनाऍं- 



कुछ शब्दों में चंदन महके, कुछ में नागफनी उग आती,
हर मधुर वाणी के भीतर, निर्मल निर्झर नहीं होते।
समय-सरिता चुपके-चुपके, कितने मुख बहा ले जाती,
हर कागज़ की नाव नियति के, उस पार नहीं होती

भॉंप रही है चिड़िया 


नग्न स्त्री के पीछे भीड़ खड़ी है
"इस कटआउट पर ध्यान मत दीजिए,
यह तो मणिपुर है,
हम समय रहते
इसे ढँक देंगे
खबरों से,
बयानबाज़ी से,
और सबसे ज़्यादा
चुप्पी से।"




अमरीका धमकी मत देना 
यह देश सुदर्शन वाला है.
इसमें तलवार मराठो की 
इसमें प्रताप का भाला है.


बात निकली तो कई राज़ भी फिर दिल से निकले,
दर्द के फूल भी कुछ अश्कों की महफ़िल से निकले।
जब अँधेरों ने कहा तो कई सीमा से निकले,
रास्ते तब ही नए एक नई मंज़िल से निकले।
हमने चाहा था कि ख़ामोश रहें जीवन भर यूँ
पर कई शब्द अचानक ही मेरे दिल से निकले।



शाम के वक्त डॉ. लुकास गोदौलिया की एक बेहद भीड़भाड़ वाली चाट की दुकान के सामने जा खड़े हुए। वहां उन्होंने देखा कि एक आदमी हाथ में पत्तल लिए खड़ा है, और हलवाई अपनी उंगली से एक कड़क गोलगप्पे (पानीपुरी) में छेद करके, उसमें चोखा भर रहा है और फिर उसे तीखे-खट्टे पानी के ड्रम में डुबोकर सीधे उस आदमी के पत्तल में फेंक रहा है। लोग बिना चबाए, पूरा का पूरा गोलगप्पा मुंह में ठँस रहे हैं और उनकी आँखों से आंसू बह रहे हैं

----------------
आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
-----------

7 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन मीठी आवाज से शुरुआत
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. आपका हृदय से आभार. पांच लिंको के सभी संपादकों के प्रति हृदय से आभार

    जवाब देंहटाएं
  3. चिंतनीय सुविचार से आगाज
    Wahhh

    जवाब देंहटाएं

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

आपकी टिप्पणियाँ एवं प्रतिक्रियाएँ हमारा उत्साह बढाती हैं और हमें बेहतर होने में मदद करती हैं !! आप से निवेदन है आप टिप्पणियों द्वारा दैनिक प्रस्तुति पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

टिप्पणीकारों से निवेदन

1. आज के प्रस्तुत अंक में पांचों रचनाएं आप को कैसी लगी? संबंधित ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर भी रचनाकारों का मनोबल बढ़ाएं।
2. टिप्पणियां केवल प्रस्तुति पर या लिंक की गयी रचनाओं पर ही दें। सभ्य भाषा का प्रयोग करें . किसी की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा का प्रयोग न करें।
३. प्रस्तुति पर अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .
4. लिंक की गयी रचनाओं के विचार, रचनाकार के व्यक्तिगत विचार है, ये आवश्यक नहीं कि चर्चाकार, प्रबंधक या संचालक भी इस से सहमत हो।
प्रस्तुति पर आपकी अनुमोल समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक आभार।