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सोमवार, 15 जून 2026

4774 ..महुआ की धरा से गुरुत्वाकर्षण की समीपता

सादर अभिवादन 




विक्रम ने वेताल के कान में उत्तर दिया—
"क्योंकि उस राज्य में धर्म, करुणा और न्याय का मार्ग न रहकर प्रदर्शन और पाखंड का 
उपकरण बन चुका था। लोगों को प्रश्न पूछने के बजाय जयकार करना सिखा दिया गया था।"

उत्तर सुनते ही वेताल ठहाका लगाकर फिर उसी पेड़ से जा लटका।





धरम के नाम पे बाँट देहला अंग्रेजन जइसे,
फूट के सरहद पर अबो तैनात सिपाही बा।

देखा कतल जेकर भयल ओही बा कातिल
एही बात के बदे त अदालत में गवाही बा।





मौसम के मिज़ाज जितने बिगड़ रहे हैं ।
गुलमोहर उतने ही दहक रहे हैं ।
टूट कर खिल  रहे हैं..गीत बन गए हैं ।
क्यों न हम भी चलें रंग बटोरने के लिए !
देखो तपते हुए गुलमोहर खिल रहे हैं !






चिहुंका था मन पाकर महुआ का वह गंध
प्रस्फुटित चेतना में भाव कहे तर्क करे दंग
महुआ की धरा से गुरुत्वाकर्षण की समीपता
महुआ के प्रभाव में मिलती है बौद्धिकता






माटी का यह क्षुद्र खिलौना, 
स्वयं गगन का स्वप्न बने
बूँद-बूँद में सिंधु समाया, 
कण-कण में अनहद स्वर तने

पीड़ा पनिहारिन बनकर जब, 
नयनों से निर्झर भरती है
तब अनुभव की स्वर्णिम गंगा, 
अंतर्मन में उतरती है

आशा नववधू बन आती, 
केसर-वर्णी भोर लिए
सपनों के माणिक चुनती है, 
अंबर की चितचोर लिए।




सादर समर्पित
सादर वंदन

4 टिप्‍पणियां:

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