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शुक्रवार, 24 अप्रैल 2026

4722 ..विदा होता अप्रैल कुछ-कुछ कहता है

 सादर अभिवादन



विदा होते मास की प्रकाशित
रचनाएँ



प्रज्ञा की सुंदर बेलें  हो, 
दृढ़  इच्छाओं के वृक्ष लगे,
धार प्रेम की बहती जाये 
मेधा,प्रज्ञा की ज्योत जगे !






और फिर
डार्विन के सिद्धांत के अनुसार
धीरे-धीरे
विलुप्त होते गए।

अब बची हैं बस
उनकी कहानियाँ,
कुछ दुर्लभ किस्से—
जिन्हें सुनकर
लोग मुस्कुरा देते हैं,
मानो कोई कल्पना हो।





द्वैत नहीं, वो इक अद्वैत,
बस, बांट जाती है, उन्हें अनुभूतियां,
अतिरंजित कर जाती हैं, चेतना,
यूँ, बढ़ जाते हैं संशय,
बनती जाती है, अतिशयोक्ति!





मेरी कविताओं का शीर्षक कुछ भी हो
लेकिन वो जीती हैं अपनी ही शर्तों
के तहत, मेरे जीवन का गंतव्य
अज्ञात सही, बियाबान से
लेकर समंदर तक मुझे
तलाश है एक अदद
सुकून की अपने
अंदर तक,
अपनी
ही शर्तों के तहत ।





प्रशांत बाबू उसका सवाल सुन कर मुस्कुराए, “तुम बहुत होशियार हो, एकदम सही बिन्दु पर 
पहुँच जाती हो प्रिया. वे एएसएल के सामने कल यह कह सकते हैं 
कि 'देखिए, हमने तो मजदूरों को एडवांस दे दिया है, हम उनके भले की सोच रहे हैं, 
लेकिन घाटे के कारण अब हम चला नहीं सकते'. 
वे अपनी छवि सुधारने की कोशिश करेंगे. लेकिन हम कल उन्हें इस जाल में नहीं फंसने देंगे. 
कल हमें यह साबित करना ही होगा कि क्लोजर का आवेदन केवल एक ढोंग है."

सादर समर्पित
सादर वंदन
रचनाए

6 टिप्‍पणियां:

  1. आभार
    आगामी अंक श्वेता जी लेकर आएंगी
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. मुझे शामिल करने हेतु असंख्य धन्यवाद । नमन सह

    जवाब देंहटाएं
  3. साधुवाद स्वीकारें
    सुन्दर अंक

    जवाब देंहटाएं
  4. सुप्रभात! सराहनीय रचनाओं से सजी सुंदर प्रस्तुति, 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु आभार!

    जवाब देंहटाएं
  5. सभी रचनाएं अच्छी हैं। सुन्दर संकलन हेतु आभार एवं अभिनंदन।

    जवाब देंहटाएं

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