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मंगलवार, 17 मार्च 2026

4684...कौओं की पंचायत से...

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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भूख के एहसास पर
आदिम युग से
सभ्यताओं के पनपने के पूर्व
अनवरत,अविराम
जलते चूल्हे...
जिस पर खदकता रहता है
अतृप्त पेट के लिए
आशाओं और सपनों का भात, 
जलते चूल्हों के
आश्वासन पर 
निश्चित किये जाते हैं
वर्तमान और भविष्य की
परोसी थाली के निवाले
 उठते धुएँ से जलती
पनियायी आँखों से
टपकती हैं 
 मजबूरियाँ
कभी छलकती हैं खुशियाँ,
धुएँ की गंध में छिपी होती हैं
सुख-दुःख की कहानियाँ
जलती आग के नीचे
सुलगते अंगारों में
लिखे होते हैं 
आँँसू और मुस्कान के हिसाब
बुझी आग की राख में
उड़ती हैंं
पीढ़ियों की लोककथाएँ
बुझे चूल्हे बहुत रूलाते हैं
स्मरण करवाते हैं
जीवन का सत्य 
कि यही तो होते हैं 
मनुष्य के
 जन्म से मृत्यु तक की 
यात्रा के प्रत्यक्ष साक्षी। #श्वेता


आज की रचनाऍं- 
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कौओं की पंचायत से,
फदगुदियाँ ले रहीं होड़।
अपना हुक़ूक़ हैं जता रहीं,
गिलहरियाँ माटी कोड़-कोड़।

सन्नाटे का सुर सरोवर,
शकल दिल-सी रंगी नील।
जलतरंग में छाया नर्तन,
गोद गिरि गदरायी झील।



पक्की, मोटी, दृढ़ दीवारें 

मान्यताओं, पूर्वाग्रहों की, 

कोई इन्हें तोड़ने निकले 

झर जाएँगी भुर भुर करतीं !

जो जैसा है, वैसा ही है 

होड़ छोड़ ख़ुद में टिक जाये, 

 तोड़ रहा जो सूत्र प्रेम का 

जोड़, मोड़ से वापस आये ! 





मृदु समीर स्पंदन है मन के वन में,
अनुबंधन अलक्षित भावों का तन में,
निर्मल प्रेम जहाँ झरता है निश्चल सा
और कोई नियमबद्ध आचरण नहीं होता।
प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।


मगर
मेरी आवाज़
समुंदर के शोर में
कहीं खो जाती है,
तुम तक पहुँचने से पहले ही
पानी उसे निगल लेता है।



समय की कमी थी। शादी ब्याह के कार्यक्रम भी अटेन्ड करना थे अतः बहुत लंबा न रुक पाए मगर जितना भी रुके पाण्डे दंपति की मेहमान नवाजी ने दिल जीत लिया। हमारे साथ हमारे साडू भाई भी थे वो भी शहर के इतना नजदीक गाँव के माहौल से बहुत प्रभावित हुए। खास तौर पर पाण्डे जी के सानिध्य में चिड़ियों का दाना चुगना उन्हें काफी भाया।

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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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6 टिप्‍पणियां:

  1. प्रेम की भाषा का कोई व्याकरण नहीं होता।।
    सुंदर अंक
    आभार
    सादर
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. सुप्रभात! एक से बढ़कर एक रचनाओं का गुलदस्ता सजा दिया है आज के अंक में आपने श्वेता जी, 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु शुक्रिया!

    जवाब देंहटाएं
  3. बुझी आग की राख में
    उड़ती हैंं
    पीढ़ियों की लोककथाएँ
    बुझे चूल्हे बहुत रूलाते हैं - वाह!!!!!!!!! बहुत ही सुंदर रचना!

    जवाब देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया संकलन, श्वेताजी। हमारी भी बहुत दिनों के बाद चिट्ठी आई है।

    जवाब देंहटाएं
  5. जन्म से मृत्यु तक की
    यात्रा के प्रत्यक्ष साक्षी
    अद्भुत है यह एहसास
    सुन्दर अंक

    जवाब देंहटाएं

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