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रविवार, 15 मार्च 2026

4682..अपनी कब्र का कौन परवाह करता है..सब पड़ोसी की साज सज्जा देखते हैं

 सादर अभिवादन 

बिना किसी लाग-लपेट के
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एक कदम
दूसरा कदम
तीसरा कदम
चौथा भी
फिर कोई कदम नहीं। 

***

पेड़ पर घोंसला
लटका रहा पूरे साल
पक्षी लौटा 
और 
टूट गई घोंसले वाली वो डाल।




और बाउजी कैसे हो.......... 
संजय के मुंह से ये सुनते ही नरेंद्र बाउजी के दिल का गुबार सा फूट पड़ा..... 
एकदम बोले 

"अब तक ठीक थे."
क्यूँ! अब क्या हुआ? संजय ने पूछा 

कुछ नहीं भाई, खाने के लाले पड़ गए -लगभग रोते हुए बाउजी बोले.

क्यूँ! बिजनेस में घाटा हो गया क्या -संजय ने चिंतित होते हुए पूछा.

अरे नहीं! गैस खत्म हो गई -बाउजी ने बताया.




भूख की आँखों में जलते प्रश्न हैं,
उनसे आँखें आप भर कर देखिये

तालियों से सच बदलता ही नहीं,
आईनों से भी गुज़र कर देखिये





स्वप्न देखा है मानव ने
न जाने कितनी-कितनी बार
लायेगा चिरस्थायी शांति
इक दिन वह
स्वर्ग से धरा पर उतार
चैन की श्वास लेंगे जब जन
 बहेगी प्रीत की बयार.. 





‘उलूक’ पूरी जिंदगी कट जाती है 
खबर दूर देश की चलती चली जाती है
अपने बगल में ही खुद रही कब्र से 
मतलब रखना उसपर बहस करना
उसकी खबर को 
अखबार तक पहुँचने देने वाले से बड़ा बेवकूफ 
कोई नहीं होता है ।


सादर समर्पित
सादर वंदन

5 टिप्‍पणियां:

  1. आज भाई रवीन्द्र जी नहीं हैं
    गैस की लाईन में लगे हैं कल से
    सादर वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. हमेशा की तरह संग्रहनीय लिंक्स, मेरी लघुकथा को स्थान देने के लिए आभार 🙏🙏

    जवाब देंहटाएं
  3. गैस की क़िल्लत दूर होने वाली है, सुप्रभात!! आज के सुंदर संयोजन में 'मन पाये विश्राम जहाँ' को स्थान देने हेतु बहुत बहुत आभार!

    जवाब देंहटाएं

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