शुक्रवारीय अंक में
आप सभी का हार्दिक अभिनंदन।
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कितनी अजीब बात है न
शांति के लिए युद्ध का आह्वान
जीवन के लिए मृत्यु का वाहन
क्यों
शांति के लिए क्या युद्ध ही विकल्प है.?
एक कविता पढ़िए -
युद्ध
के सामने
अहिंसा शब्द
कितना बौना हो जाता है
दया और प्रेम
छटपटाते हुए मरते
दिखाई देते हैं
करुणा
के परखच्चे उड़ते हैं
धड़ाकों के साथ
इमारतें
विकास से लड़ते हुए
हो जाती हैं मलवे में तब्दील
आकाश
भर जाता है धुएँ से
ज़मीन
साक्षी बन रही होती है
खंडहरों की
ताक़तवर दर्ज़ करता है
फ़तह
लाशों के ढ़ेर पर
मानवता को कुचलते हुए
करुणा का गला घोंट कर।
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रचयिता का नाम याद नहीं मुझे
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आज की रचनाऍं-
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तारों ने
अपनी दहकती भट्टियों में
संलयन की क्रिया चलाई
हाइड्रोजन से हीलियम,
हीलियम से कार्बन,
और आगे…
जब तक लोहा
स्थायित्व की सीमा बनकर न उभरा।
अधिकार
हठ से
तमस
नहीं होता उजास,
रात
नहीं होती भोर,
पक्षीवृंद
नहीं करते कलरव,
कलियाँ
नहीं होतीं कुसुमित,
कुक्कुट भी
बाँग नहीं देते,
शिथिलता
दृढ़ता नहीं होती,
अयोग्यता
योग्यता नहीं होती,
केवल
मिलते हैं अवसर
छीन लेने के
दूसरों के अवसर
होने के सिंहासनारूढ़
प्रवंचना और धूर्तता के।
रिमझिम बौछार
फूलों सी महक
निर्दोष चहक
मिले , गिले - शिकवे
की जगह न रहे
इस होली रंग यूँ रंगे
हर मन खुशी झूम उठे
कोई क्षण भर न उदास रहे
उस रात उसने अपनी नई 'संबल' नोटबुक में लिखा, "आयुष गुवाहाटी में उस दुनिया को जीने का आरंभ कर चुका है, जिसे मैं यहाँ कागज़ों पर उतार रही हूँ. हम दोनों के बीच का यह संवाद ही हमारा असली हथियार है. दिसंबर में चाचा तो न आने पाएंगे लेकिन वापस लौटने पर युद्ध अब केवल उसके जीवन को सगाई में बांध देने के खिलाफ नहीं, बल्कि मेरी एक स्वतंत्र पहचान के लिए होगा."
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आज के लिए इतना ही
मिलते है अगले अंक में।
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लाजवाब अंक
जवाब देंहटाएंआभार
सादर
वंदन
बेहतरीन अंक
जवाब देंहटाएं