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गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

4651..चांदी की तरह..

 ।।भोर वंदन।।

आज गुरुवारिय प्रस्तुति में ब्लॉग 'लिखो यहां वहां' पर नजर डालिए..✍️

राजेश सकलानी जी की कविताएं

 


 कपास से बनी नरम रातें.

 

हमारे लिए नहीं है कपास से बनी हुई नरम रातें

उन पर हमारा कोई बस नहीं है ,

 हमारे शत्रु रोज़ उन्हे अपनी ओर खींच लेते हैं

बेईमानी से,

 उनकी कई तहें बना कर

अपने काबू में कर लेते हैं

अश्लील शान्ति के साथ  मुस्कराते हैं ,

और अश्लील स्वप्न देखते हैं

  अपनी शर्मिन्दगी को छुटा  कर

 हम औरतें और आदमी अपने बच्चों से आंखें मिलाना चाहते हैं इन रेशमी रातों में ,

  जिनका निर्दोष स्पर्श  छत की तरह तन जाना चाहता  हैं,

 और कुटिल हवाओं से त्वचा की सुरक्षा करना चाहता  हैं,

 

सारी रात  अंधड़ की तरह बुरी आवाज़ें

 उन्मत्त होतीं हैं,

वे आज़ादी के ख़याल को तहस-नहस करना चाहतीं हैं,

और कच्ची दीवारों में बने सुराखों से घुस कर

हमारी नींदों को बिछौनों सहित उड़ा देतीं हैं,

 

इन्ही रातों के नीचे  तानाशाह अपनी फ़ौज़ों के साथ

रक्तपात के मंसूबे बनाते हैं ,

लूटे हुए माल असबाब को तहखानों में  छिपा कर  चांदी की चादरों से ढ़क देते हैं

 

हमारी हड्डियां बर्फ़बारी से

 मुक़ाबला करतीं थक जातीं हैं

पर  डटी रहतीं हैं,

हमारी मज्जा में हरक़त मचती है.


 हमारी नौली चांद पर है.

(गांव में पानी का स्रोत )

 

हमारी नौली चांद पर है

वह जितनी सुन्दर है

उतना ही दुख देती है

छेनी से काट काट कर

उसे सजाया मैने

झर झर  झर झर

उससे पानी गिरता है

चांदी की तरह..

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '..✍️

 

2 टिप्‍पणियां:

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