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शनिवार, 21 फ़रवरी 2026

4660...हमने खुद को विश्व-स्तर का बनाने का बीड़ा उठाया है

 सादर अभिवादन 



माह ए रमजान चालू आहे

19 तारीख से एक माह तक 
मौसम मे गर्मी का नामोनिशान नहीं रहेगा
भगवान भी उपवास रखने वालों के लिए
दिन की तपन को दूर करने का साधन बनाता है 
 
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सूरत आँखों में है बसी
मन में समाई है हंसी
अब तो ऐसे ही
मन रहा है बहल .

याद बने अब हकीकत
रहो साथ अब हर वक्त
अब तो आकर सदा के लिये  
मेरी जिदंगी दो बदल 





अगर हम कभी दोबारा मिलेंगे 
क्या बातों के पैबंद 
जख्मों को सिलेंगे? 
रिश्तों की गाँठें कड़ी होंगी 
या फिर टूटे सिरे खुल के बिखरेंगे ? 




वो अपनी प्रेमिका से
अपना खाली बंटवा 
भरने की जिम्मेदारी देता है
प्रेमिका उसे प्रेम समझते हैं






अरे! हमने खुद को
विश्व-स्तर का बनाने का बीड़ा उठाया है,
हम तो हर गिरने वाले पर
अभियोग पत्र लाने की तैयारी में हैं।

गड्ढों की आँखें नहीं होतीं,
पर गिरने वालों के पास भी
आँखें कहाँ होती हैं!






वेद पुराण हमें सिखलाते, सरल मार्ग अपनाना।
रामायण से हमने अपने, आदर्शों को जाना।।
श्लोकों के हर बीज मंत्र में, ऊर्जा अमित समायी।
दया धर्म का पाठ पढ़ाकर, मानवता ले आयी।।
कहते कृष्ण सार जीवन का, मानो इसे न क्रंदन।
गर्वित हो अपने भारत का, करते हैं हम वंदन।।





न तुझसे मिला, न देखा
तू कायनात में उसी दिन आई
जब एक सूखा जंगली गुलाब डायरी में मिला




आज भी
तनिक भारी हो गया है ये अंक
सादर वंदन

3 टिप्‍पणियां:

  1. आदरणीय , मेरी लिखी रचना "बहलता रहेगा तब तक ये दिल " को इस गरिमा मय मंच में स्थान देने के लिए बहुत धन्यवाद!
    इस अंक में सभी सम्मिलित रचनाएँ बहुत उम्दा है । सभी को बहुत बधाइयाँ ।
    सादर ।

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