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सोमवार, 9 फ़रवरी 2026

4648...बाकी मुँह पर ताला हउवै...

 शीर्षक पंक्ति; आदरणीय जयकृष्ण राय तुषार जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आइए पढ़ते हैं आज की पसंदीदा रचनाएँ-

भावों की अभिव्यक्ति

होता था  पहले  मे'यार   कभी   उनका,
अब  रिश्तों को  धन से  तोला जाता है।

मिल  जाती  है   एक  नई  इच्छा  उसमें,
मन  को  जितनी  बार  टटोला जाता है।
*****

आया सुंदर भोर

     मिटा   मन  के
          सारे   अवसाद 
     आया प्यारा सुंदर भोर
   सूर्य-किरण फैली चहुँ ओर 
  सभी जीव का मन विहसता
 खुशियों से तन - मन हुलसता
  उड़ी चिरैया भर मन उल्लास
    चहक कर करती परिहास
         खुश कर मन उदास
*****

अदृश्य विभाजनकिरण अपने बिस्तर पर वज्रासन की मुद्रा में थी. वह खादी के स्थान पर एक महंगे ट्रैकसूट में थी. और राजपूत परिवार की फिटनेस के प्रति सचेतता अभिव्यक्त कर रही थी.****चूड़ीदार ...

कुछ प्रतिक्रियाओं के अनुसार Public Place में तो उन्हें ऐसी पोशाक पहननी ही नहीं चाहिए थी। ऐसी पोशाक उन महानुभावों के लिए राष्ट्रीय सम्मान का सवाल था।

तो फिर यही लोग देश की तमाम महिला Athlete और महिला तैराक के लिए Public Place पर किस तरह की पोशाक पहनने की सलाह देंगे भला ? 

*****

एक प्रेम गीत लोकभाषा में-प्रेम के रंग

सिर्फ़ एक दिन प्रेम दिवस हौ

बाकी मुँह पर ताला हउवै

ई बाजारू प्रेम दिवस हौ

प्रेम क रंग निराला हउवै

*****

फिर मिलेंगे। 

रवीन्द्र सिंह यादव 










6 टिप्‍पणियां:

  1. मुँह पर तो कितना रस घोला जाता है,
    पीछे जाने क्या-क्या बोला जाता है।
    सुंदर संयोजन
    नए ब्लॉग मिले
    आभार
    वंदन

    जवाब देंहटाएं
  2. आभार, अनवरत को यहाँ शामिल करनेके लिए.

    जवाब देंहटाएं
  3. सुप्रभात! लोक रंग से सजी सुंदर प्रस्तुति

    जवाब देंहटाएं
  4. जी ! .. सादर नमन आपको संग हार्दिक आभार आपका .. हमारी बतकही को इस मंच तक लाने के लिए ...

    जवाब देंहटाएं

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