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गुरुवार, 5 फ़रवरी 2026

4644..कोशिश कम रही..

 उषा स्वस्ति ।।




प्रकृति कैसे बताऊं तू कितनी प्यारी,

हर दिन तेरी लीला न्यारी,

तू कर देती है मन मोहित,

जब सुबह होती प्यारी।


नरेंद्र शर्मा 

बदलते मौसमों में सूर्य की हल्की हल्की गर्माहट संग ..लिजिए प्रस्तुतिकरण के

 क्रम को आगें बढ़ातें हुए रूबरू होते हैं.. ✍️

शीशे सा टूट बिखर नहीं जाऊं कहीं


मेरा दर्द नज़र ना आए किसी को

मुस्कान अधरों पे बिछाये रखती हूॅं ।


दिल रोये असर ना दिखे किसी को

आनन पर सिंगार सजाये रखती हूॅं ।

✨️

पीताम्बरी

गोधूलि साँझ रिमझिम ओस लटों सेज क्षितिज धरा बेलों लाली से l

मिट्टी धागों कायनात निखर आयी थी बुनकर चरखे सायों स्याही से ll



कोरे सादे कागज मिथ्या सत्य सी खोई थी परछाई कपोल नजारों से l

इशारों महकी उल्फतों ने लिख डाली सौगात आयतें महताब लाली से ll

✨️













वक्त के उजले सफों पर गर्द सी कुछ जम रही

लाख चाहा भूलना पुरज़ोर, कोशिश कम रही !

✨️

तहकिकात अभी जारी रहेगी

✨️

पम्मी सिंह ' तृप्‍ति '

4 टिप्‍पणियां:

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