स्वामी विवेकानंद जी ने कहा एक नायक बनो और सदैव यह कहो “मुझे कोई डर नहीं है”।
एमर्सन ने कहा "डर सदैव अज्ञानता से पैदा होता है"।
ओशो ने कहा, उस तरह से मत चलिए जिस तरह से डर आपको चलाये, बल्कि उस तरह चलिए जिस तरह ख़ुशी आपको चलाये, उस तरह चलिए जिस तरह प्रेम आपको चलाये।
गाँधी जी ने कहा हमारा वास्तविक शत्रु हमारा डर है।
मेरी समझ से परिस्थितियों के अनुसार भय के अनेक रूप है किंतु यह हम पर निर्भर है कि भय का सामना किस प्रकार किया जाये। विशेषकर जिनके हाथों में क़लम है उनका दायित्व तो सबसे महत्वपूर्ण हो जाता है,तो आप का भय आपकी ईमानदारी से कितना बड़ा है ये आप तय करें।
स्मृतियों की कतरनें भीकर देतीं मरहम पट्टी ।
किसी दिन फिर कभीउङेगी पतंग कहीं !आकाश के चंदोबे पेसलमा-सितारों सी !हवा में तैरती मलंग सी,नीली नदी में गोते लगाती,इठलाती, बल खाती,उचक कर ठहर जातीधूप की मचान पर !
वह 1000 Watt का बल्ब
पूरे शहर को रौशन करने की ज़िद में
खुद को जला बैठता है,
और अपनी ही तपिश से—
फ्यूज हो जाता है




सुन्दर संकलन
जवाब देंहटाएंधन्यवाद प्रस्तुत अंक में सम्मिलित करने के लिए।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंनमस्ते श्वेता जी । भूमिका से ही खाका खिंच गया ! भय का सामना क्यों और कैसे किया जा सकता है ..सभी रचनाएँ जिजीविषा के धागे से बँधी हैं । सभी रचनाकारों को संवेदनशील लेखन के लिए बधाई ! और इस माला में हमें भी पिरोने के लिए आपका अनंत आभार । नमस्ते ।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर तरीके से अभिव्यक्त किया है ।
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