आपसभी का हार्दिक अभिनन्दन।
नार्वे में बसे हिंदी साहित्यकार डॉ. सुरेशचंद्र शुक्ल 'शरद आलोक' की कई रचनाएँ प्रकाशित हुई हैं। उन्होंने हिंदी, उर्दू और नार्वेजियन भाषाओं में लिखा है।
हिंदी में उनके सात कविता संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं। चर्चित संग्रहों में 'प्रवासी का अंतर्द्वंद्व' (इसमें 61 कविताएँ हैं) और "लॉक डाउन" शामिल हैं।
हिंदी में एक और उर्दू में एक कहानी संग्रह प्रकाशित हुआ है। उनकी एक कहानी 'विसर्जन से पहले' भी चर्चित है।
उन्होंने नार्वेजियन साहित्य का हिंदी में प्रचुर मात्रा में अनुवाद किया है, जिसमें हेनरिक इबसेन के नाटक ('गुड़िया का घर', 'मुर्गाब') और कुत हामसुन का उपन्यास ('भूख') शामिल हैं।
वे नार्वे में हिंदी की पत्रिकाओं 'परिचय' और 'स्पाइल' (दर्पण) का संपादन 21 वर्षों से अधिक समय से कर रहे हैं।
उनकी रचनाएँ मानवीय संवेदनाओं और प्रवासी जीवन के अनुभवों को अभिव्यक्ति देती हैं। उनकी कहानियों पर तीन टेलीफिल्में भी बन चुकी हैं।
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ऊषा राजे सक्सेना एक सुप्रसिद्ध प्रवासी हिंदी लेखिका और कवयित्री हैं, जो वर्तमान में यूनाइटेड किंगडम (UK) में निवास करती हैं। उनका जन्म 22 नवंबर 1943 को गोरखपुर, उत्तर प्रदेश में हुआ था। वे पिछले कई दशकों से ब्रिटेन में रहकर हिंदी साहित्य और संस्कृति के प्रचार-प्रसार में महत्वपूर्ण योगदान दे रही हैं।
उन्हें हिंदी साहित्य के क्षेत्र में उनके योगदान के लिए कई प्रतिष्ठित सम्मानों से नवाजा गया है:
उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान द्वारा 'विदेशों में हिंदी साहित्य सेवा सम्मान'।
पद्मानंद साहित्य सम्मान।
बाबू गुलाबराय स्मृति साहित्य सेवा सम्मान।
उनकी कुछ कहानियाँ जापान के ओसाका विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में भी शामिल की गई हैं।
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मैंने सीमित नामों का उल्लेख किया है
कृपया आपकी जानकारी में और जो भी
नाम है उनके बारे में भी बताइये।





आज हिंदी केवल साहित्य की भाषा नहीं रही, बल्कि डिजिटल दुनिया और इंटरनेट पर भी इसकी पैठ बढ़ी है, फिर भी इसे राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं मिलना हमारी वैचारिक विडंबना का परिचायक कहें या कुछ और,,,,,
जवाब देंहटाएंबहुत-बहुत आभारी हूॅं कविता जी।
हटाएंआपकी प्रतिक्रिया मन को राहत पहुंचा गयी कि रचनाओं के अतिरिक्त भी कुछ और जानकारी साझा की जा सकती है।
सादर।
कृपया साथ बने रहें।
श्वेता जी, सुबह-सुबह सरसरी नज़र से देखा उत्सुकतावश तो दिल से बेसाख्ता निकला .. वाह ! क्षमा कीजिएगा, दिन भर में अब पढ़ने और प्रतिक्रिया देने का अवसर मिला । आपने विश्व हिन्दी दिवस के अनुरूप दुनिया के अलग-अलग कोनों में हिन्दी प्रेमी विद्वानों/विदुषियों का परिचय दिया। वास्तव में इस जानकारी से यह प्रामाणिक अनुभूति होती है कि हिन्दी को चाहने वाले दुनिया भर में हैं। हिन्दी विश्व की तीसरी सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा है। अपने देश में भले ही हिन्दी थोपे जाने की राजनीतिक बहस होती हो.. पर वह एक अलग विषय है। तीसरे नंबर की भाषा, और एक भी नोबल पुरस्कार नहीं ? भाई-बहन सम्मान भी नहीं ? बचपन से ज्ञानपीठ द्वारा हिन्दी में अनूदित भारत की प्रांतीय भाषाओं का साहित्य पढ़ा और नोबल से सम्मानित साहित्य भी आंग्ल भाषा में पढ़ा । समझ में आया कि हिन्दी और अन्य भारतीय भाषाओं का साहित्य इतना समृद्ध है कि उनकी थाह किसी ने पाई ही नहीं होगी। हिन्दी ने कई भाषाओं के शब्द अपनाए और अलग-अलग लहजों में बोली गई .. हिन्दी की सहजता और सरलता को सर विश्व अपना रहा है। हिन्दी अपनी तो है ही !
जवाब देंहटाएंहृदयतल से आपका आभार, श्वेता जी। यशोदा सखी बहुत प्रसन्न होतीं..
प्रिय नूपुरं जी,
हटाएंसुबह से अनगिनत बार सूना कमेंट बॉक्स उदास करता रहा, यशोदा दी की बहुत याद आई अभी आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर बहुत- बहुत अच्छा लग रहा। साहित्यिक मंच सिर्फ रचनाएं प्रकाशित करने का माध्यम नहीं है अपितु साहित्य ज्ञानवर्धक विषयों को आदान-प्रदान करने का साधन भी होना चाहिए। मुझे बहुत निराशा और चिंता होती है दिन-ब-दिन पाठकों की ब्लॉग के प्रति अरूचि महसूस करके।
सप्ताह में एक दिन किसी भी विषय पर पाठकों एवं चर्चाकारों के मध्य संवाद का कोई सूत्र होना चाहिए न।
फिलहाल आपकी प्रतिक्रिया मुस्कान दे गयी ।
सादर आभारी हूं।
कृपया साथ बने रहे।
शुभकामनाएं
जवाब देंहटाएंआभारी हूं सर ,आप जैसे सजग, निरंतर सक्रिय चिट्ठाकार ही इस चिट्ठाजगत की अंतिम टिमटिमाती उम्मीद की रोशनी है ।
हटाएंसादर प्रणाम सर।
कृपया स्नेह और साथ बनाये रखें।
सादर।
प्रिय श्वेता, आप सबका आभार जता रही हैं पर वास्तव में तो हम आपके आभारी हैं . इस निरंतरता और समर्पण की भावना को मेरा प्रणाम . हमारा हिंदी दिवस हो या विश्व हिंदी दिवस, हम केवल शुभकामनाएँ देकर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर ले रहे हैं कभी कभी मन में एक अपराध बोध सा महसूस होता है.
जवाब देंहटाएंआपने इस अंक में हिंदी साहित्य के लिए महत्त्वपूर्ण योगदान देने वाले अंतर्राष्ट्रीय लेखकों और हिंदी का वैश्विक स्तर पर प्रचार प्रसार करने वाले महान साहित्यकारों से परिचित कराया जो प्रशंसनीय है, साधुवाद.