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मंगलवार, 6 जनवरी 2026

4615...हँसते हैं लोग अब मेरे जज़बात देखकर

मंगलवारीय अंक में
आपसभी का स्नेहिल अभिवादन।
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अंधविश्वास में आकंठ डूबी भेड़े

चलती रहती हैं भेड़चाल।

बरगलाकर, भक्ति में डूबे

सरल भेड़ों को 

हाथ की सफाई के

भ्रमजाल फैलाता गड़रिया

चालाकी और धूर्तता की छड़ी से

हाँक लेता है अपने

बाड़े में,

झूठे अवतारवाद के

मायाजाल में उलझी

चमत्कार की आशा में

ख़ुश होती हैं भेड़ें

पाखंडी गड़रिया की 

चरण-वंदना में,

और गड़रिया उद्धारक बना

भेड़ों को मारकर

 खा जाता है...।

#श्वेता


आज की रचनाऍं- 

वो भी चला गया है थाम हाथ किसी का
हँसते हैं लोग अब मेरे जज़बात देखकर !

वो छोड़कर चले, जो कभी हमकदम रहे
मेरी तबीयत को जरा, नासाज देखकर !


मौसम के मेले में ,
छाये ज्यों खजूर और पिस्ता ।
धूप हुई है भुनी मूँगफली ,
गजक करारी खस्ता ।
सूरज के बटुआ से गिरी ,
रुपैया जैसी धूप ।



देश में उनके प्रतीक्षारत दोस्त,परिजन 
उनके साथ आने वाले सस्ते आईफोन की प्रतीक्षा में अधिक व्याकुल रहते 
मनुष्य के जरिया बन जाने का अच्छा उदाहरण बन गई थी वे
विदेशी भाषा में इतनी निपुण थी 
कि अकेले कर सकती थी शॉपिंग
यात्राएं अभी भी पति के भरोसे थी 





इसमें कई 
विधा के गेंदें  -
गुड़हल खिलते हैं ,
बंजर  मन  
को इच्छाओं  के  
मौसम मिलते हैं |
लैम्पपोस्ट में 
पढ़िए या फिर 
दफ़्तर, ढाबों में |






क्या ..

राजेश जोशी की कविता 'इत्यादि' का इत्यादि हूँ मैं ?

या फिर ..

भ्रष्टाचारी का ख़ाकी या सज़ायाफ़्ता की खादी हूँ मैं ?

या ..

बढ़ती ज्यामितीय आकार से वतन की आबादी हूँ मैं ?

या ..

विकास की आड़ में कुदरती आपदा की मुनादी हूँ मैं ?

या ..

धर्मनिरपेक्ष होकर भी आरक्षण भोगी जातिवादी हूँ मैं ?





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आज के लिए इतना ही
मिलते हैं अगले अंक में।
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5 टिप्‍पणियां:

  1. जी ! .. आपको मन से नमन एवं आपका आभार हमारी बतकही को इस मंच तक मौका देने के लिए ...
    काश ! .. यशोदा जी इसे पढ़ पातीं .. उनको (उनकी शाश्वत आत्मा को) सादर नमन 🙏
    आज की भूमिका भेड़ और भेड़िया की बिम्ब से विडम्बनाओं की कटु सत्य को उजागर करती हुई ...

    जवाब देंहटाएं
  2. अत्यंत सुंदर अंक, सार्थक भूमिका !
    बाड़ ही खेत खाने लगी है हर तरफ, कहीं पढ़ा था -
    अब कोई खतरे की बात ही नहीं
    अब हर किसी को हर किसी से खतरा है !
    बहुत बहुत शुक्रिया मेरी रचना और रचना की शीर्षक पंक्ति लेने हेतु...
    पाँच लिंकों पर सब वैसा ही है पर यह जरूर महसूस होता है आकर, जैसे मायके में सब कुछ हो पर माँ ना हो !

    जवाब देंहटाएं
  3. धन्यवाद, श्वेता जी..सुंदर संकलन एवम भूमिका । चिरैया सी धूप बङी भली लगी ।

    जवाब देंहटाएं
  4. सभी लिंक सुन्दर हैं । मेरी कविता को शामिल करने के लिए बहुत आभार

    जवाब देंहटाएं

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