शीर्षक पंक्ति: आदरणीया अनीता सैनी जी की रचना से।
सादर अभिवादन।
आइए पढ़ते हैं पाँच पसंदीदा रचनाएँ-
ले चलो
उस ऊँचाई पर
जहाँ स्त्री
एक प्रश्न नहीं,
एक उत्तर लगती है।
उन रास्तों पर ले चलो
जहाँ हर सरसराहट
कोई कथा नहीं रचती है,
केवल
एक स्वीकार बनकर
मन में उतर जाती है।
*****
मेरे ख़्वाबों में बसते हो मुक़द्दर में हो न हो चाहे
लकीरों में
तुझे देखूं अमानत मेरी हो न हो चाहे
कश्मक़श में
जीती रख तुझे नज़र के समंदर में
उल्फ़त है
मुझे तुमसे तुझे इक़रार हो न हो चाहे।
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ख़ामोश वापसी भाग–3 : उम्मीद का धीमा उजाला
पहली पायलट रन रिपोर्ट सुबह
पाँच बजे आई. रिकार्डो ने कॉफ़ी का घूँट लिया और पीडीएफ़ खोला. पहले पन्ने पर एक
ग्राफ़ था: "जोखिम स्कोर बनाम जनसंख्या घनत्व." वह आगे बढ़ा. नामों की
सूची शुरू हुई.
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फिर मिलेंगे।
रवीन्द्र सिंह यादव
बहुत अच्छी हलचल प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंआप कविता, विचार और सूचना को ऐसे जोड़ते हैं कि मन रुककर पढ़ना चाहता है। स्त्री को प्रश्न नहीं, उत्तर के रूप में रखना मुझे बहुत सशक्त लगा। ख़ामोशी, भरोसा और लिखने की यात्रा वाला हिस्सा बेहद ईमानदार लगा। बीच में साहित्यिक इतिहास का संदर्भ पढ़कर लगा कि आप अतीत और वर्तमान को साथ चलाते हैं।
जवाब देंहटाएंबहुत सुंदर संकलन।
जवाब देंहटाएंहार्दिक धन्यवाद सर आपका कविता के शब्दों को शिर्षक पर स्थान देने हेतु।
सादर नमस्कार।
आप बहुत दिनों बाद दिखीं...आपकी रचना सदैव की भांति बेहद शानदार रही
हटाएंअच्छी प्रस्तुति
जवाब देंहटाएंसुंदर संकलन। मेरी रचना को स्थान देने के लिए धन्यवाद।
जवाब देंहटाएंशानदार रहीं सभी रचनायें...धन्यवाद रवींद्र जी इतनी विचारशील प्रस्तुतियां पढ़वाने के लिए आभार
जवाब देंहटाएंरवींद्र जी, धन्यवाद। विविधतापूर्ण संकलन ।
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