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गुरुवार, 18 दिसंबर 2025

4605...पत्ते पीले हो कर, सब्ज़ नहीं होते ...

 शीर्षक पंक्ति: आदरणीया डॉ.(सुश्री) शरद सिंह जी की रचना से। 

सादर अभिवादन। 

आज पढ़िए ब्लॉगर डॉट कॉम पर प्रकाशित रचनाएँ-

शायरी | रिश्तों की तासीर | डॉ (सुश्री) शरद सिंह

पत्ते पीले हो कर, सब्ज़ नहीं होते 
इनसे समझो रिश्तों की तासीर कभी
*****

नानी का डंडा

*****अब नहीं लौटना
उन दोनों की लड़ाई का अंत हमेशा बच्चों पर होता. बरसों से बच्चों को माँ-बाप का प्यार नसीब नहीं हुआ था. लोग कुत्ता पालते हैं तो उससे भी दुलार जताते हैं, लेकिन रीमा तो उस दुलार से भी महरूम थी. माँ-बाप काम पर जाते तो उसे राहत मिलती. माँ बाप की लड़ाई के बीच छठी कक्षा तक ही वह पढ़ पायी थी. फिर दिन में वह वहीं झुग्गियों के बीच एक लिफाफे बनाने वाली वर्कशॉप में काम करने लगी, जहाँ उसकी तरह अधिकांश नाबालिग काम किया करते थे. वहीं वह जीतू से मिली, दोनों दोस्त बने. एक दूसरे के दर्द साझा करने लगे.*****फिर मिलेंगे। रवीन्द्र सिंह यादव 

2 टिप्‍पणियां:

  1. सुप्रभात! सुंदर प्रस्तुति!!

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  2. वाह ! सार्थक सूत्रों से सुसज्जित आज की हलचल ! मेरी लघुकथा को इसमें स्थान दिया आपका हृदय से बहुत-बहुत धन्यवाद एवं आभार रवीन्द्र जी ! सादर वन्दे !

    जवाब देंहटाएं

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