पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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बुधवार, 9 अगस्त 2017

754..दरकार है ..आज भी उसी सदा की..

 ९/८/ २ ० १ ७ 

   ||ॐ सूर्याय नम :||  

 नमस्कार एवम शुभेच्क्षा 

आज़  दिनांक ९  अगस्त  का ऐतिहासिक महत्व
  
9 अगस्त 1942  अगस्त क्रांति के नाम से

 प्रसिद्ध  " भारत छोड़ो आंदोलन " गाँधी जी

 के नेतृत्व में संचालित स्वतंत्रता आंदोलन की

 अंतिम महत्वपूर्ण लड़ाई थी.

 इस आंदोलन का  मूलमंत्र

' करो  या मरो ' था..

सो अथ इस कथ्य से 

    आवाज़े मद्धिम पड़ने लगी है 

      मानो बहुत दूर से आ रही थी ..

                 शायद गुम  होती  जा  रही   

                 दरकार है ..आज भी उसी सदा की..
                                
                                                     

चुन लेते
कुछ ख़्वाब कहीं से

गीत छंद की दुनिया में

हम भी किसी कविता की

भूली बिसरी कोई पंक्ति हो लेते...  

पर हमें तो..

                          चलिए आज की लिंक की ओर नज़र डालते है..   
           
 आदरणीया मधुलिका पटेल जी द्वारा रचित संवेदनशील रचना..




वह श्रृंगार अधूरा सा क्यों है 

अब क्या और किस बात की जिरह 

मेरे पास नहीं है वो ज़ेवर 

जो तुम्हे वर्षों पहले चाहिए थे.
.
आदरणीया अनामिका जी द्वारा रचित 

 हिंदी लेखन के माहौल में स्त्री की

 स्थिति को दर्शाती बेहद महत्वपूर्ण बातचीत...



स्वयं को कमजोर एवं असहाय स्थिति में पाती है।

कुछ पत्रिकाओ में रचनाये छपवा कर और एक-दो

 गोष्टियो में हिसा लेने के उपरांत प्रायः

स्त्रियाँ  गायब हो जाती है। जो टिकती है

उनकी संख्या नगण्य कही जा सकती है।

क्या उसके लिए हिंदी के प्रतिष्ठित लेखक और संपादक

 जिम्मेदार है, जिन्हे हम हिंदी के व्यापक

  सांस्कृतिक वातावरण का हिस्सा

  मान सकते है, या कोई 

अन्य कारण है ?

 ब्लॉग ताऊ डाट इन  से  अनमोल प्रस्तुति..


आज रायता दिवस है यारो...अफ़वाह की कोशीश मुकम्मल की जाये..



आज संटू भिया के कबाडखाने में उनको फ़्रेंडशिप बैंड बांधने



 पहुंचे ही थे कि सामने एक अनिंध्य सुंदरी को बैठे पाया.



 उसे देखते ही हमारे मन में संटू भिया के प्रति,

आज मित्रता दिवस होने के बावजूद भी

 अमित्रता दिवस वाली फ़ीलींग आने लगी….
.
हमारे सामने ही बैठी सुंदरी ने 

शायद हमारे मन के


आदरणीय राजेश कुमार राय जी द्वारा रचित सुंदर  रचना..



कोई खुशी है या कोई गम है


आँख हमारी  क्यों पुरनम है



प्यार तुम्हारा  मेरा  ख़जाना


जितना दे दो  उतना  कम है



आदरणीया रेणू बाला जी द्वारा  सामाजिक 

समरसता को बटोरती खूबसूरत   रचना..



इक  बरगद  तो  बचा  है 
जिसके  नीचे  बैठते   -
  रहीम  चचा  हैं !!  

हर आने -जाने वाले को सदायें  देते  हैं -
  
चाचा  सबकी  बलाएँ  लेते हैं  ,

 धन कुछ  पास  नहीं  उनके

सम्यक् समीक्षा कर शब्दों में तब्दील करेंं..
 || समाप्तम् ||
धन्यवाद 

पम्मी  सिंह 


    
    



13 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात
    आदरणीय पम्मी जी
    आज का अंक बेहतरीन ,मनभावन
    उम्दा प्रस्तुति व सुन्दर शब्दों से सजी
    रंग -बिरंगे लिंकों की लड़ियाँ हृदय को
    स्पर्श कर रहीं हैं
    सभी रचनाकारों एवं पाठकों को बधाई।
    आपकी समीक्षा अपेक्षित हैं
    आभार।
    ''एकलव्य''

    उत्तर देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात पम्मी बहन
    कुछ हटकर एक गम्भीर प्रस्तुति
    हमारे देश का इतिहास देखते हुए
    आज के परिवेश मे हम सर्वथा
    अपने ही देश की बर्बादी करते रहते हैं
    आँखे लोगो की बंद हो चुकी है
    सारे अपने बारे में ही सोचने लगे हैं
    सादर..

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत ही सुंदर प्रस्तुति। बधाई। प्रभात अभिवादन
    ।।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुंदर लिंको का सुंदर प्रस्तुति करण पम्मी जी।
    बधाई एवं शुभकामनाएँ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुन्दर मनभावन संकलन

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत ही सुन्दर प्रस्तुतिकरण...
    उम्दा लिंको का चयन....

    उत्तर देंहटाएं
  7. आकर्षक प्रस्तुतिकरण ! बधाई !

    उत्तर देंहटाएं
  8. सभी रचनाएँ बेहतरीन हैं । विविधता के रंगों से सजी इस प्रस्तुति के लिए पम्मी जी को बधाई । सभी चयनित रचनाकारों को भी बधाई । सभी रचनाएँ पढ़ीं । बहुत सुंदर हैं । पम्मीजी द्वारा अंक का प्रस्तुतिकरण भी बहुत सुंदर है ।

    उत्तर देंहटाएं
  9. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

    उत्तर देंहटाएं
  10. आदरणीय पम्मी जी - आज के सफल संयोजन पर आपको बहुत बधाई | आजके संयोजन में कविताओं के साथ पद्य रचनाएँ उल्लेखनीय रही | कथित ''अफवाह देवी '' पर सार्थक व्यंग बड़ा ही रोचक और सराहनीय रहा | साहित्य साधिका आदरणीय अनामिका से हुई बातचीत झझकोरने वाली है | साहित्य जगत के कई अनसुने पहलुओं से अवगत होना नया अनुभव था | 75साल पहले आजके दिन शुरू हुए भारत छोड़ो आन्दोलन को समर्पित ये संयोजन हमें याद दिलाता है कि उन विभूतियों को नमन करें जिनकी बदोलत आज हम आजादी की खुली फिजा में साँस ले रहे हैं | मेरी रचना को आजके संयोजन का हिस्सा बनाने के लिए आपकी हार्दिक आभारी हूँ |

    उत्तर देंहटाएं

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