पाँच लिंकों का आनन्द

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मंगलवार, 16 अगस्त 2016

396...सवाल उतने नहीं हैं, जवाब जितने हैं

जय मां हाटेशवरी....

कल भारत ने अपना 70वां स्वतंत्रता दिवस बड़े जश्न के साथ मनाया...
पर आजादी के 70 वर्ष बाद भी...हम राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के अनशन  को न तोड़ पाए...
महात्मा गांधी आज़ादी के दिन दिल्ली से हज़ारों किलोमीटर दूर बंगाल के नोआखली में थे, जहां वे हिंदुओं और मुसलमानों के बीच सांप्रदायिक हिंसा को रोकने के लिए अनशन पर थे. जब तय हो गया कि भारत 15 अगस्त को आज़ाद होगा तो जवाहर लाल नेहरू और सरदार वल्लभ भाई पटेल ने महात्मा गांधी को ख़त भेजा. इस ख़त में लिखा था, "15 अगस्त हमारा पहला स्वाधीनता दिवस होगा. आप राष्ट्रपिता हैं. इसमें शामिल हो अपना आशीर्वाद दें."

 गांधी ने इस ख़त का जवाब भिजवाया, "जब कलकत्ते में हिंदु-मुस्लिम एक दूसरे की जान ले रहे हैं, ऐसे में मैं जश्न मनाने के लिए कैसे आ सकता हूं. मैं दंगा रोकने के लिए अपनी जान दे दूंगा."

अब पेश है... आज की चुनी हुई रचनाएं...

सवाल उतने नहीं हैं, जवाब जितने हैं
स्वतंत्रता दिवस के ठीक पहले हमारी संसद के मॉनसून सत्र का समापन हुआ है। एक अर्से के बाद संसद के दोनों सदनों में संजीदगी दिखाई दी। कम से कम दो अवसरों पर, जीएसटी और कश्मीर पर चर्चा के दौरान, सभी राजनीतिक दलों के बीच सर्वानुमति भी दिखाई दी। यह सर्वानुमति हमारी ताकत है। सीमा पर सेना हमारी रक्षा करती है, पर असली राष्ट्रीय सुरक्षा हमारी सर्वानुमति में निहित है। यह सर्वानुमति तब तक सम्भव नहीं है जबतक इसमें हम सब की भागीदारी न हो। दूसरे शब्दों में जन-जागृति के बगैर सम्भव नहीं है।
हमारे संविधान का अनुच्छेद 19 नागरिक को छह प्रकार की स्वतंत्रताओं की गारंटी देता है। भाषण और अभिव्यक्ति, एकत्र होने सभा करने, संगठित होने, भारत के भीतर कहीं भी आने-जाने, कहीं भी निवास करने तथा कोई भी पेशा अपनाने की स्वतंत्रता। इन स्वतंत्रताओं के संरक्षण की पूरी मशीनरी भी है। दावे के साथ नहीं कहा जा सकता कि ये स्वतंत्रताएं पूरी हैं और सभी नागरिकों को उपलब्ध हैं। पर सिद्धांततः इन्हें लागू कराया जा सकता है। पर इन दिनों हम जिस ‘आज़ादी’ की बात सुन रहे हैं उसकी बुनियाद में भारत के संविधान को खारिज करने की माँग है। यह नारा है ‘कश्मीर बनेगा पाकिस्तान।’ यह नारा भारत की बहुरंगी, धर्म-निरपेक्ष व्यवस्था का निषेध करता है। हमें अपनी खामियों से नजरें चुरानी नहीं चाहिए, पर इस विषय में बात केवल उसके साथ की जा सकती है, जो सिद्धांततः हमारे साथ है। बहरहाल आज़ादी की कीमत है अनंत जागरूकता। खतरा इस बात का नहीं है कि कोई हमें फिर से गुलाम बना देगा। खतरा यह है कि हम जिन मूल्यों के सहारे अपनी व्यवस्था का संचालन कर रहे हैं उन्हें ठेस लगेगी। हमारा ध्यान 26 जनवरी और 15 अगस्त जैसे राष्ट्रीय पर्वों पर व्यवस्था के वृहत स्वरूप पर जाता है। आज हमें सोचना चाहिए कि वे कौन से मूल्य हैं, जिनके हम हामी हैं? और उन्हें लेकर हम कितने संवेदनशील है?

एक खयाल आजाद एक खयाल गुलाम एक गुलाम आजाद एक आजाद गुलाम
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आजाद खयाल
आजाद रूहें
करें अपने
हिसाब किताब
लिये अपने
जारी और रुके
हुए जरूरी
देश के सारे काम
एक गुलाम
‘उलूक’ का
अपने जैसे
गुलामों के लिये
है बस ये
गुलाम खयाल
आजाद पैगाम ।

आज़ादी....!
तुम मना लोगे
इनके बनाए हुए
झंडे बिना आज़ादी
क्या है कोई हल...?
जो पूरा कर दे इनके
छोटे - छोटे सपने
जो दिला सके इन्हें
भूख और गरीबी से
आज़ादी....!

वेश वाणी भेद तज कर हो तिरंगा सर्वदा ...
लक्ष्य पर दृष्टि अटल अंतस हठीला चाहिए
शेष हो साहस सतत यह पथ लचीला चाहिए

हों भला अवरोध चाहे राह में बाधाएं हों
आत्मा एकाग्र चिंतन तन गठीला चाहिए

मन जाना राष्ट्रीय पर्व का
आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और देश-भक्ति की भावना लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। चरित्रवान, ओजस्वी, देश के लिए कुछ कर गुजरने वाले नेताओं से लोगों को प्रेरणा मिलती थी।  यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी
बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के ड़र से या और किसी मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। ऐसे दिन, वे चाहे गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस में सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं। क्योंकि आखिर इस दिवस ने किसी का क्या बिगाड़ा है, इसने तो हमें भरपूर खुश होने का मौका ही दिया

आज के लिये इतना ही...

जो नहीं कहते  वंदे मातरम,
पाकिस्तानी झंडा लहराते हैं,
जो दे रहे हैं देश को गाली
वो कौन है? वो कौन हैं?
जो पनाह देते हैं, आतंकवादियों को,
भारत को खंडित करना चाहते हैं,
अफजल की फांसी का विरोध करने वाले,
वो कौन है,? वो कौन हैं?

धन्यवाद।









4 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात
    बहुत अच्छा चयन
    साधुवाद
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुप्रभात बहुत खुबसूरत
    प्रस्तुति
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति कुलदीप जी । आभार 'उलूक' के सूत्र 'एक खयाल आजाद एक खयाल गुलाम एक गुलाम आजाद एक आजाद गुलाम' को जगह देने के लिये ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं

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