पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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शुक्रवार, 29 जुलाई 2016

378...श्रेष्ठ धर्म कौन सा है?...

जय मां हाटेशवरी...

आज हर तरफ धर्म पर चर्चा हो रही है...
सभी अपने धर्म  को श्रेष्ठ  बता रहे हैं...
इस लिये आज की प्रस्तुति का आरंभ...
इस छोटे से प्रसंग से...
   एक राजा था।  उसने  दूर-दूर खबर कर कि जो भी धर्म श्रेष्ठ होगा, मैं उसे स्वीकार करूंगा। अब तो उसके पास एक से बढ़कर एक विद्वान आने लगे, जो अपने धर्म की श्रेष्ठता का बखान करते हुए दूसरे के धर्म के दोष गिनाते। लेकिन राजा के सामने कुछ सिद्ध न हो पाया कि कौन धर्म चरम धर्म है। कौन सर्वोत्कृष्ट धर्म है? जब यही सिद्ध न हुआ तो राजा अधर्म के जीवन में जीता रहा। उसने कहा, जिस दिन सर्वश्रेष्ठ धर्म उपलब्ध हो जाएगा, उस दिन मैं धर्म का अनुसरण करूँगा।  जब तक सर्वश्रेष्ठ धर्म का पता ही नही है, तो मैं कैसे अपना जीवन को छोडू और बदलूँ? तो जीवन तो वह अधर्म में जीता रहा, लेकिन सर्वश्रेष्ठ धर्म की खोज में पंडितो के विवाद को सुनता रहा।  ऐसे ही दलीले सुनते-सुनते राजा का जीवन बीतने लगा।
फिर तो राजा बूढ़ा होने लगा और घबरा गया कि अब क्या होगा? अधर्म का जीवन दुःख देने लगा। लेकिन जब सर्वश्रेष्ठ धर्म ही न मिले, तो वह चले भी कैसे धर्म की रह पर?
अंतत: वह एक प्रसिद्ध फकीर के पास गया। राजा ने संत को अपनी परेशानी बताते हुए कहा - मैं सर्वश्रेष्ठ धर्म की खोज में हूं। लेकिन आज तक मुझे वह नहीं मिल सका है। फकीर ने कहा - सर्वश्रेष्ठ धर्म! क्या संसार में बहुत से धर्म होते हैं, जो श्रेष्ठ और अश्रेष्ठ धर्म की बात उठे, धर्म तो एक है। कोई धर्म अच्छा, कोई धर्म
बुरा, यह तो होता ही नहीं। सर्वश्रेष्ठ का सवाल ही नहीं है। राजा बोला, लेकिन मेरे पास तो जितने लोग आए, उन्होंने कहा हमारा धर्म श्रेष्ठ है। उस फकीर ने कहा, जरुर उन्होंने धर्म के नाम से मैं श्रेष्ठ हूँ यही कहा। उनका अहंकार बोल होगा। धर्म तो एक है, अहंकार अनेक है। राजा से उसने कहा, जब भी कोई पथ से बोलता है किसी
धर्म से बोलता है, तो समझ लेना, वह धर्म के पक्ष में नही बोल रहा है, अपने पक्ष में बोल रहा है। और जहाँ पक्ष है, जहाँ पथ है, वहाँ धर्म नही होता। धर्म तो वही होता है जहाँ व्यक्ति निष्पक्ष होता है। पक्षपाती मन में धर्म नही हो सकता है।
   राजा प्रभावित हुआ।उसने कहा, तो फिर मुझे बताओ, मैं क्या करु? उस फकीर ने कहा- आओ नदी के किनारे चलते हैं वहीं बताऊंगा। नदी पर पहुंच फकीर ने कहा - जो सर्वश्रेष्ठ नाव हो तुम्हारी राजधानी की , तो उसमें बैठ कर उस तरफ चलें। राजा ने कहा यह बिलकुल ठीक है। राजा जाए तो सर्वश्रेष्ठ नाव आनी चाहिए। बीस-पच्चीस जो अच्छी से अच्छी नावें थी, वे बुलाई गई। और वह फकीर भी अजीब था, एक-एक नाव में दोस निकलने लगा कि इसमें यह खराबी है, इसमें यह दाग लगा हुआ है। यह तो आपके बैठने के योग्य नही है। राजा भी थक गया। सुबह से साँझ हो गई। भूखा प्यासा राजा फकीर से बोला - क्या बकवास लगा रखा है, इनमें से तो कोई भी नाव पार करा देगी और अगर नाव पसंद नहीं है, तो खुद ही तैर कर पार कर लें, छोटी सी नदी तो है। फकीर हंसने लगा और बोला - यही तो मैं सुनना चाहता हूं। राजन! धर्म की कोई नाव नहीं होती। धर्म तो तैरकर ही पार करना होता है, खुद। कोई किसी दूसरे को बिठाकर पार नहीं करा सकता।
   धर्म की कोई नाव नही होती। और जो कहता हो धर्म की नाव  होती है, समझ लेना, धर्म से उसे कोई मतलब नहीं, कोई नाव चलाने वालो का व्यापारी होगा वह, जो नाव चलाने वाले है, उनका व्यपार है उनकी कोई नाव नही है। धर्म तो तैर कर ही पार करना होता है-व्यक्तिगत।
     वे जल्दी नदी में उतरे और पर हो गए। वह थोड़ी देर की बात थी, लेकिन नाव की प्रतीक्षा में और अच्छी नाव की खोज में सारा दिन व्यर्थ हुआ था।

अब पेश है...
कुछ पढ़ी हुई रचनाओं में से...
कुछ चुनी रचनाएं...

आज हम फिर बँट गए ज्यों गड्डियां हो तास की
s320/playing-cards
आज हम महफूज है क्यों दुश्मनों के बीच में
आती नहीं है रास अब दोस्ती बहुत ज्यादा पास की
बँट  गयी सारी जमी ,फिर बँट  गया ये आसमान
आज  हम फिर  बँट गए ज्यों गड्डियां हो तास की

हमारी दुनियां न्यारी रे
सभी को, कष्टों में दरकार
तभी आता ईश्वर का ध्यान
मुसीबत में ही आते याद
सिर्फ परमेश्वर के दरबार ,
चर्च हो या मस्जिद प्यारे
हर भवन में , ईश्वर न्यारे ,
पीठ पर है निर्भय अहसास
आस्था के , वारे न्यारे !

कारण
दर्द नहीं है जिज्ञासा कि जिसको छूकर देखा जाये
नहीं दर्द कि परिभाषा कि जिससे समझ में आ जाये
ये तो उपपरिणाम है किसी लक्ष्य के पीछे का
जितनी ज्यादा हो लगी लगी ये उतना ही बढ़ता जाये।
जितनी गहराई से सोचा कि इस मंज़िल को पा जाये
दुनिया सारी छूटे मुझसे पर ये आँचल में आ जाये

सुनो ज़िन्दगी
हूँ ,इस इंतजार में
अभी कोई पुकरेगा मुझे
और ले चलेगा
कायनात के पास .......
जहाँ गया है सूरज
समुंदर की लहरों पर हो कर सवार
"क्षितिज" से मिलने

हम बात तुम्हारी क्यों माने ?
जो पड़ा सामने  एकाक्षी  या दिया किसी ने अगर  छींक
तुमको वापस रुकना  होगा ,ये शकुन हुआ है नहीं ठीक
ये तो नित की घटनाएं है ,होती  रहती  है  अनजाने
हम बात तुम्हारी क्यों माने ?



मन के कपाट....रश्मि शर्मा 
 अब चलूं कुणाल के पसंदीदा पनीर की सब्‍जी और बूंदी रायता बना लूं। आज वो जल्‍दी लौटेंगे, मैं जानती हूं। शादी के गुजरते सालों में प्‍यार कम हो न हो, कहीं दबता चला जाता है। हम अपनी-अपनी उम्‍मीद पूरी नहीं होने का रोना तो रोते हैं मगर कोई पहल नहीं करते। आज मैं शुरूआत कर ही दूं। कुणाल जो अपने मन के कपाट बंद करने लगे हैं वो, अब मैं उसे खोलकर रहूंगी, झगड़े से नहीं, प्‍यार से।


प्रकृति नर्तन
दिमाग से निकलीं ये सारी उपजें समग्र रूप से व्यर्थ हैं। इनका कहीं कोई मोल नहीं है। जरा अपने चारों ओर देखिए तो। प्रकृति ने श्रावण के रूप में कितना मोहक रूप धारण किया हुआ है। दो-तीन दिन बादलों से ढका आकाश जब कुछ समय या एक दिन के लिए सूर्यप्रकाश में दमकता है तो धरती-आकाश सहित पेड़-पौधों की हरियाली कितनी स्वच्छ और कांतिवान लगती है। यही नैसर्गिक उपक्रम हैं जिन्हें आत्मसात कर हम अपने मानुष होने का उद्देश्य समझ सकते हैं। यह काम भारत देश में राजनीति करने या नौकरी ढूंढने जैसा उलझा हुआ नहीं है। यह उपलब्धि तो आपको अपनी दृष्टि में बदलाव करते ही प्राप्त हो जाएगी।

नन्हां मित्र
जब यह बड़ा होगा
हरा भरा वृक्ष होगा
यहीं आ कर
विश्राम भी करूंगी |

माया ममता मोहिनी ,जिन बिन दंता जग खाया , मनमुख खादे ,गुरमुख उबरै ,जिन राम नाम चित लाया
कई आस्थाएं ,विश्वास  वहीँ अटके हुए हैं जहां मोहम्मद साहब के समय थे ,कई मायावतियां मनमुखि ,सुमुखियाँ गुरु -विहीन,दिशाहीना , आत्महीन वहीँ अटकी हुईं हैं ,संसद में आज उनकी ही अनुगूंज सुनाई देती है।
जेहाद गुरु मुखी होना है अवगुणों के खिलाफ जंग हैं मन का सुख ,मन की गुलामी नहीं हैं। मनमानी नहीं है ,भटकाव नहीं है त्याग है अवगुणों का।













कलाम को सलाम
प्रारम्भिक जीवन में अभाव के बावजूद वे किस तरह राष्ट्रपति के पद तक पहुँचे ये बात हम सभी के लिये प्रेरणास्पद है। उनकी शालीनता, सादगी और सौम्यता किसी महापुरुष
से कम नही है। डॉ. कलाम बच्चे हों या युवा, सभी में बहुत लोकप्रिय रहे हैं। अपने सहयोगियों के प्रति घनिष्ठता एवं प्रेमभाव के लिये कुछ लोग उन्हे ‘वेल्डर ऑफ पिपुल’ भी कहते हैं। देश के हर युवक हर बच्चे के प्रेरणा श्रोत हैं। उनका कहना था “ सपने देखना बेहद जरूरी है, लेकिन सपने देखकर ही उसे हासिल नही किया जा सकता।

आज के लिये इतना ही काफी है...
मिलते रहेंगे...
धन्यवाद।











 

4 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात..
    बहुत ही अच्छी प्रस्तुति
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुप्रभात
    सादर प्रणाम
    सुन्दर हलचल प्रस्तुति

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुन्दर प्रस्तुति कुलदीप जी ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर हलचल प्रस्तुति ..

    उत्तर देंहटाएं

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