पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद

समर्थक

शुक्रवार, 17 जून 2016

336....लिखने के लिए बाज़ुओं में ताक़त चाहिए और जिगर भी..

जय मां हाटेशवरी...


समर्थ गुरु रामदास छत्रपति शिवाजी के गुरु थे। वह भिक्षाटन से मिले अन्न से अपना भोजन करते थे। एक बार उन्होंने शिवाजी के महल के द्वार के बाहर से भिक्षा मांगी।
शिवाजी गुरु की आवाज पहचानकर दौड़े-दौड़े बाहर आए और बोले, यह क्या करते हैं महाराज, आप हमारे गुरु हैं। भिक्षा मांगकर आप हमें लज्जित कर रहे हैं।
रामदास ने कहा, शिवा! आज मैं गुरु के रूप में नहीं, भिक्षुक के नाते यहां आया हूं। शिवाजी ने एक कागज पर कुछ लिखकर गुरु के कमंडल में डाल दिया। गुरु ने उसे
पढ़ा। लिखा था, 'सारा राज्य गुरुदेव को अर्पित है।' उन्होंने कागज को फाड़कर फेंक दिया और वापस जाने लगे। शिवाजी ने कहा, गुरुदेव, क्या मुझसे कोई भूल हुई है जो आप जा रहे हैं? गुरुदेव ने कहा, भूल तुमसे नहीं, मुझसे हुई है। मैं तुम्हारा गुरु होकर भी तुम्हें समझ
नहीं पाया और न ही मैं तुम्हारे अंदर से तुम्हारे अहंकार को निकाल पाया। तुम राजा नहीं, एक सेवक हो। शिवाजी ने कहा, मैं तो तन-मन-धन से जनता की सेवा करता हूं। अपने को राजा समझता ही नहीं। गुरु रामदास ने कहा, शिवा, जो चीज तुम्हारी है ही नहीं, उसे तुम मुझे
दे रहे हो, यह अहंकार नहीं तो और क्या है? मैं राज्य लेकर क्या करूंगा? मुझे तो दो मुट्ठी दाना ही काफी है। यह राज पाट, धन दौलत सब जनता की मेहनत का फल है।
इस पर सबसे पहले उसका अधिकार है। तुम बस एक समर्थ सेवक हो। एक सेवक को दूसरे सेवक की चीज को दान देना राजधर्म नहीं है। उसकी रक्षा करना ही तुम्हारा धर्म है।'
शिवाजी पसोपेश में पड़ गए। उनकी कसमसाहट को समझकर गुरुदेव ने कहा, वत्स! यदि शिष्य गुरु के वचनों को अंगीकार करके प्रायश्चित करके अपने को सुधार ले तो वह प्रिय
शिष्य कहलाता है। शिवाजी गुरुदेव की भावना समझ गए।


अब पेश है....आज की कड़ियां....

तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं
वैसे हंसकर कहें, यदि बुरा न लगे
तुम निछावर हुये हो,हमीं पर नहीं !
इक भरोसा सा है, दौड़ोगे एक दिन
तुम मिलोगे तो ही,पर जमीं पर नहीं

















वर्ण पिरामिड
है
भीती
अधीती
जयहिंद
हिम ताज है
तोड़ न सका है
जयचंद संघाती

दोहे
चढ़ा भेंट भगवान को, चाहते कटे पाप
घुस से कुछ होता नहीं, कटौती नहीं पाप
कर्म फल भुगतना यहीं, जानो यही विधान
क्षमा माँग सजदा करो, निष्फल होता दान

मैं स्त्री
s320/maya%2Bkya%2Bhe
मैं स्त्री
कृष्ण बनने की कला जानती हूँ
अपने अंदर गणपति का आह्वान करके
अपनी परिक्रमा करती हूँ
मैं स्त्री,
धरती में समाहित अस्तित्व
जिसके बगैर कोई अस्तित्व नहीं
न प्राकृतिक
न सामाजिक
और मेरे आँसू
भागीरथी प्रयास  ...

लिखने के लिए बाज़ुओं में ताक़त चाहिए और जिगर भी..
बंदूक थामी है तुमने
तो जरूर तुम्हारे बाजुओं में
ताक़त होगी और जिगर भी,
फिर क्यों बन्दूक हाथ में ले रखी है तुमने
कलम ही काफ़ी है इनके लिए
जिनसे तुम लड़ रहे हो। 

समंदरों की सियासत ...
हरेक   दरिय :   को    प्यारी   है    अपनी   आज़ादी
समंदरों  की    सियासत    किसी  को  क्या  मालूम
अभी-अभी    तो   कहन   में     निखार     आया  है
अभी   हमारी  मुहब्बत   किसी  को    क्या  मालूम

बकरोटा पहाड़ : डलहौजी का सौंदर्य
s400/DSC_0167%2Bcopy '
ढलती शाम में अमि‍त्‍युश 
s400/DSC_0281
उग आई रौशनी पहाड़ों पर
क्रमश.....



धन्यवाद


5 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात..
    चुरा लिया है तुमने जो दिल को

    बेहतरीन प्रस्तुति
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. शुभ प्रभात
    सस्नेहाशीष पुतर जी
    उम्दा प्रस्तुतिकरण हमेशा की तरह
    आभार आपका

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर शुक्रवारीय प्रस्तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति हेतु अाभार !

    उत्तर देंहटाएं

आभार। कृपया ब्लाग को फॉलो भी करें

आपकी टिप्पणियाँ एवं प्रतिक्रियाएँ हमारा उत्साह बढाती हैं और हमें बेहतर होने में मदद करती हैं !! आप से निवेदन है आप टिप्पणियों द्वारा दैनिक प्रस्तुति पर अपने विचार अवश्य व्यक्त करें।

टिप्पणीकारों से निवेदन

1. आज के प्रस्तुत अंक में पांचों रचनाएं आप को कैसी लगी? संबंधित ब्लॉगों पर टिप्पणी देकर भी रचनाकारों का मनोबल बढ़ाएं।
2. टिप्पणियां केवल प्रस्तुति पर या लिंक की गयी रचनाओं पर ही दें। सभ्य भाषा का प्रयोग करें . किसी की भावनाओं को आहत करने वाली भाषा का प्रयोग न करें।
३. प्रस्तुति पर अपनी वास्तविक राय प्रकट करें .
4. लिंक की गयी रचनाओं के विचार, रचनाकार के व्यक्तिगत विचार है, ये आवश्यक नहीं कि चर्चाकार, प्रबंधक या संचालक भी इस से सहमत हो।
प्रस्तुति पर आपकी अनुमोल समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक आभार।




Related Posts Plugin for WordPress, Blogger...