पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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मंगलवार, 12 अप्रैल 2016

270...उड़ती धूल, बंद होती आँखें

जय मां हाटेशवरी...

कितना पावन है, हमारा भारत देश....
जहां आज हर तरफ मां भवानी की जय-जय कार हो रही है...
थोड़ी देर के लिये हम भी....जय-जयकार करें....
अपनी माता रानी की....
जिसकी हम सभी को कृपा प्राप्त हो रही है....

अब देखिये आज के मेरे द्वारा चयनित लिंक....
सब तो रोये थे मगर हम तो, रो नहीं पाये
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कसम खुदा की सिर्फ खैरियत बता जाएँ !
खिले वसंत अहले दिल से,खो नहीं पाये !
जाने कब से थी मेरे साथ,जानता भी नहीं
बिन कहे जान सकें अक्ल,वो नहीं पाये


खटीमा में हुआ राष्ट्रीय दोहाकारों का सम्मान
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कार्यक्रम के समापन अवसर पर विगत वर्षों में संस्था व साहित्य से जुड़े रहे श्री घासी राम आर्य, श्रीमती श्यामवती देवी, डाॅ. के.डी.पाण्डेय, श्री देवदत्त
प्रसून, श्री केषव भार्गव, श्री अशोक भट्ट आदि को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
     कार्यक्रम समाप्ति की घोषणा अध्यक्ष डाॅ. रूपचन्द्र शाास्त्री ‘मयंक’ ने की। इस अवसर पर डाॅ. सिद्धेश्वर सिंह, श्रीमती सुरेन्द्र कौर,  सतपाल बत्रा, नरेश
चन्द्र तिवारी, तेज सिंह शाक्य, श्रीमती अमर भारती, अमन अग्रवाल मारवाड़ी, के.सी.जोशी, रत्नाकर पाण्डेय, जुहेर अब्बास, महत, दिनेश पाण्डेय, नितिन शास्त्री,
विनीत शास्त्री, श्रीमती कविता, श्रीमती पल्लवी, डाॅ. राज सक्सेना ‘राज’, कैलाश चन्द्र पाण्डेय, देवदत्त यादव आदि उपस्थित रहकर कार्यक्रम को सफल बनाया।


उड़ती धूल, बंद होती आँखें
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सड़क पर रेंगते-रेंगते चलता उन दोनों बच्चों का रिक्शा एक मंदिर के बाहर बने बरामदे के किनारे रुक जाता है. उनके पीछे-पीछे चलते-चलते हमारे कदम भी ठहर जाते हैं.
कुछ बात की जाये या नहीं? कुछ मदद की जाये या नहीं? सोचते-सोचते उन बच्चों के पास पहुँच गए, जो अब वहीं किनारे लगे नल के पानी से मुँह धोते हुए, पानी पीते हुए
आपस में हलकी-फुलकी सी चुहलबाजी करने लगते हैं. पिछले कई मिनटों की प्रौढ़ता उनके चेहरे से अब गायब दिखती है. उनके नल से हटते ही जो जानकारी ली, उससे उनकी दयनीय
दशा का भान हुआ. उनकी पारिवारिक स्थिति के साथ-साथ उनके जैसे लगभग एक दर्जन बच्चों का ऐसे ही कबाड़ बीनने में लगे होने के बारे में पता चला. भयंकर गरीबी से जूझते
उन परिवारों के स्त्री-पुरुषों के पास इस साल कोई काम नहीं. सूखे ने खेतों में मिलते काम को भी समाप्त कर दिया. किसी तरह का कोई तकनीकी हुनर न होने के कारण
वे सब ऐसे ही अनुपयोगी कार्यों में लगे हुए हैं. दो-दो, तीन-तीन लोगों की दिन भर की मेहनत के बाद शाम को दस-दस, पंद्रह-पंद्रह रुपयों का जुगाड़ हो जाता है.




मर के भी मुँह न तुझसे मोड़ना.........
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ज्ञान देना बहुत सरल है कि मरने वाले को मरना नहीं चाहिए था , मुकाबला करना चाहिए था । अपनों से अपनी बात करना चाहिए था । सच तो यह है कि यह सब प्रयत्न करने
के बाद ही आत्महत्या जैसी स्थिति की नौबत आती होगी  ।
मर के भी मुंह नहीं मोड़ेंगे , तुम्हारे प्यार में तुम्हारे बगैर जी न पाएंगे ,साथ जिए हैं साथ मरेंगे ,ऐसे संवाद जब तक कानों में पड़ते रहेंगे ,ऐसा होता रहेगा



कुछ पल
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भीनी मंद मंद मीठी मीठी
सराबोर कर के आज ...........
जैसे
धुएँ के छल्लों में
पहली कश ...
खूब थी वह खूबसूरत याद ..........



ये हँसी .......
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और हाँ
ये आँसू भी तो
बेसबब नही
इनसे ही तो
बढ़ जाता
नमक जिंदगी में .....



 
धन्यवाद।
और सुनिए ये गीत.......



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