पाँच लिंकों का आनन्द

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रविवार, 21 फ़रवरी 2016

219...इंसान ने कुत्तों से बहुत कुछ सीखा है,

सादर अभिवादन
एक बार मैं दिग्विजय
फिर से आपके समक्ष
अपनी पसंद लेकर...

दर्प दिखाती खड़ी इमारत 
सिमटे हैं नेह दालान
किरणें आती जाती देखें
सब बंद है रौशनदान
भीतर हवा सुलगती रहती
घुटन भरी साँसें कमसिन.

आहुति में..सुषमा वर्मा
वो राज तुम्हारी आँखों का,
वो जादू तुम्हारी बातो का,
वो खूबसूरती ढलती शामो की,
वो तन्हाई गहराती रातो की,

जिन्दगी की राहें में....मुकेश कुमार सिन्हा
घर के
कुछ दरवाजे और
कुछ से थोड़ी ज्यादा खिड़कियाँ
शायद आपस में कर रहे थे संवाद !!
शायद डेट पर जाने की कवायद या फिर कोई
उच्च स्तरीय बैठक, घर की सुरक्षा पर !!

जुम्बिशें में...मुंकिर
ज्ञानेश्वर का पत्थर है, और दानेश्वर की लाठी है,
समझ की मटकी बचा के प्यारे, भाग्य नहीं तो फूटा है।

बन की छोरी ने लूटा है, बेच के कंठी साधू को,
बाती जली हुई मन इसका, गले में सूखा ठूठा है।


मेरी धरोहर में......मंजू मिश्रा
कुछ तो लोग कहेंगे
कुछ तो लोग कहेंगे ही ….
कहने दो उन्हें
जो कुछ कहते हैं
तुम उनसे…
हजार गुना बेहतर हो



ये रही प्रथम व शीर्षक रचना का अंश



इंसान ने कुत्तों से
बहुत कुछ सीखा है,
सिवाय वफ़ादारी के,
मौक़ा मिलते ही
एक इंसान दूसरे को
कुत्ते की तरह काट खाता है.

अब आज्ञा दें दिग्विजय को
सादर



7 टिप्‍पणियां:

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