पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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शुक्रवार, 15 जनवरी 2016

181.....समझ नही पाता है इंसान



उत्तरायण का दूसरा दिन

आम्र मंजरी नज़र आने लगी

चलिए ले चलती हूँ आज की पसंदीदा कड़ियों की ओर...




संगम की यह रेत  
साधुओं ,सिद्ध ,फ़कीरों की , 
यह प्रयोग की भूमि , 
नहीं ये महज लकीरों की , 
इसके पीछे राजा चलता  
रानी चलती है |



मेरी पतंग

अनेक पतंगों के बीच...

मेरी पतंग उलझती नहीं,

वृक्षों की डालियों में फंसती नहीं।

पतंग

मानो मेरा गायत्री मंत्र।
धनवान हो या रंक,
सभी को कटी पतंग एकत्र करने में आनंद आता है,


उस समय सिर्फ याद आती है 
उस रब की...कि वो ही कोई राह दिखाये 
जिस पर हम खुशी-खुशी जाये॥


मकर संक्रांति आध्यात्मिक और सामाजिक दृष्टि से महत्वपूर्ण पर्व है। इसी दिन सूर्य उत्तर दिशा की ओर बढ़ता है। 
इसी दिन उत्तरायण शुरू होता है, अभी तक दक्षिणायण रहता है। 
खगोलीय दृष्टि से भी यह बहुत महत्वपूर्ण दिन है। 



हिंदी के प्रायः सभी कवि अपने उपनामों से ही प्रसिद्ध हैं.कहा तो यह भी जाता है कि इस परंपरा में विदेशी प्रभाव के साथ ही साहित्यिक चोरी भी इसका कारण रही है.अपनी कविता के बीच में अपना नाम दे देने से चोरी की आशंका कम हो जाती थी.


और ये रख दी मैंने आज की प्रथम कड़ी

सुधिनामा में...साधना वैद
जीवन जीने के लिये दो इतना अधिकार
चुन कर दुःख तुम पर करूँ सुख अपने सब वार !

 हर पग पर मिलती रहे तुम्हें जीत पर जीत
फ़िक्र नहीं मुझको मिले कदम कदम पर हार !
........
क्षमा कीजिएगा गलती हो गई
सूचना देते वक्त दिन का ख्याल ही नहीं रहा
शुक्रवार को गुरुवार लिख बैठी
ध्यान कहीं और काम कहीं का चक्कर चल गया
चलती हूँ....पर उदास मन  से नहीं
आज्ञा दें और सुने ये गीत











8 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बहुत शुक्रिया आपका |सुन्दर लिंक्स पढ़वाने हेतु आभार |

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति.मुझे भी शामिल करने के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं

  3. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति में मेरी ब्लॉग पोस्ट शामिल करने के लिए आभार!
    सबको मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं.

    उत्तर देंहटाएं
  4. मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं । सुंदर प्रस्तुति ।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुंदर लिंक संयोजन....
    आभार दीदी।

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर प्रस्तुति यशोदा जी ! मेरी रचना 'शुभाशंसा' को आपने आज की हलचल में सम्मिलित किया आभारी हूँ ! मुझे अपरिहार्य कारणों से बाहर जाना पड़ गया इसलिए विलम्ब से आपका धन्यवाद कर पा रही हूँ ! आशा है क्षमा करेंगी !

    उत्तर देंहटाएं

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