पाँच लिंकों का आनन्द

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बुधवार, 13 जनवरी 2016

179...सभी पाठकों व चर्चाकारों को पावन पर्व लोहड़ी की शुभकामनाएं...

जय मां हाटेशवरी...

सुंदर मुंदरिए - हो तेरा कौन विचारा-हो
दुल्ला भट्टी वाला-हो
दुल्ले ने धी ब्याही-हो
सेर शक्कर पाई-हो
कुडी दे बोझे पाई-हो
कुड़ी दा लाल पटाका-हो
कुड़ी दा शालू पाटा-हो
शालू कौन समेटे-हो
चाचा गाली देसे-हो
चाचे चूरी कुट्टी-हो
जिमींदारां लुट्टी-हो
जिमींदारा सदाए-हो
गिन-गिन पोले लाए-हो
इक पोला घिस गया जिमींदार वोट्टी लै के नस्स गया - हो!
यह गीत दुल्ला भट्टी वाले का यशोगान करता है, जिसने दो असहाय  कन्याओं, सुंदरी-मुंदरी' की जबरन होने वाली शादी को रुकवाकर व उनकी जान बचाकर उनकी यथासंभव जंगल
में आग जलाकर और कन्यादान के रुप में केवल एक सेर शक्कर देकर शादी की थी।  
आज पांच लिंकों का आनंद की भी पहली लोहड़ी  है...
इस लिये आनंद भी कुछ अधिक है...
तो सब से पहले पढ़ते हैं...
इस पर्व से जुड़ी   संपूर्ण कहानी...
पंजाब के लाहौर के पास शेखुपुरा एक क़स्बा है जो देश के विभाजन के बाद से
पकिस्तान का हिस्सा बन गया है | अकबर के शासन काल में शेखुपुरा और उसके आस पास के इलाके में एक राजपूत हिन्दू वीर दूल्हा भट्टी वाला सकृय था | मुग़ल शासकों की नजर में वह एक डाकू था पर हिन्दुओं के द्रष्टिकोण से एक बागी हिन्दू लड़ाका जो सरकारी खजानों को लूटता था व गरीब सताये हुए हिन्दुओं की सहायता करता था | जब बादशाह अकबर उसके छापामार हमलों से परेशान हो गया तो उसने दूल्हा भट्टी वाले को जिन्दा या मुर्दा पकड़ कर लाने की जिम्मेदारी अपने एक किलेदार आसिफ खान को सौंपी | आसिफ खान एक सैनिक टुकड़ी ले कर उस ओऱ गया जिधर दूल्हा भट्टी वाले के होने की संभावना थी और एक गाँव की मस्जिद में डेरा डाला | पूस का महीना था सर्दी बहुत अधिक थी आसिफ खान ने सैनिकों की छोटी छोटी टुकड़ियों को अलग अलग दिशा में दुल्हे को पकड़ने के लिए भेजा और स्वयं मस्जिद की छत पर लेट कर धूप सेकने लगा इसी बीच कुछ लड़कियां मस्जिद के बाहर के कूएँ पर आयीं | इनमें दो  लड़कियां  विशेष रूप से सुन्दर थी तथा नाम भी सुन्दरी मुंदरी'  था | सुन्दरी व  मुंदरी'  को देखते ही आसिफ खान के मन में उनहें पाने की इच्छा जागी | आसिफ खान ने सुन्दरी व मुंदरी'   को अपने पास बुलाया , पर वे दोनों  डर कर भाग गयी | आसिफ खान ने मौलवी से पुछा की यह लड़कियां  कौन है | मौलवी द्वारा यह बताये जाने पर की लड़कियां  पास के गावं
के ब्राहमण की बेटियां  है आसिफ खान ने लड़कियों  के पिता को बुलाने के लिए कहा | ब्राह्मण को बुलाया गया और उसे कहा गया की वो अपनी लड़कियों   का निकाह आसिफ खान के साथ कर दे पर ब्राहमण इसके लिए तैयार नहीं हुआ | ब्राह्मण को कई प्रकार के प्रलोभन दिए गए , इस पर भी जब वह तैयार नहीं हुआ तो उसे डराया धमकाया गया | ब्राह्मण समझ गया की वह बुरी तरह फंस गया है अतः उस समय अपनी जान बचाने के लिए उसने बहाना बनाया कि अभी पूस का महीना चल रहा है और हिन्दुओं में पूस के महीने में विवाह नहीं किया जाता, आसिफ खान ने ब्राह्मण को कुछ धन दिया और कहा की वो इससे लड़कियों  के लिए कपड़े गहने आदि खरीदे | दूल्हा भट्टी वाला तो मिला नहीं अतः कुछ दिन बाद वापिस लौटने से पहले ब्राह्मण से कहा की पूस का महीना समाप्त होने पर वह आयेगा और उसकी बेटियों  से निकाह करेगा | आसिफ खान लौट गया | परेशान ब्राह्मण ने सोचा की इस परिस्थिति में दूल्हा ही उसे बचा सकता है अतः वह दुल्हे को ढूँढने के लिए जंगल की और चला | दुल्हे से भेंट होने पर ब्राह्मण ने अपनी सारी परेशानी कि किस प्रकार मुस्लिम किलेदार आसिफ खान डरा धमका कर दबाव डाल कर जबरदस्ती उसकी बेटियों  से निकाह करने जा रहा है | दुल्हे ने ब्राहमण को आश्वासन दिया कि वो चिंता न करे वह उसकी बेटियों  की रक्षा करेगा | दुल्हे ने दो  ब्राहमण युवकों  को दोनों लड़कियों  से विवाह के लिए तैयार किया और पूस माह के आखिरी दिन गावं में आया और दोनों बेटियों  को विवाह के लिए अपने साथ ले गया एवं पूस मास की अंतिम रात्रि को जब पूस मास समाप्त हो रहा था और माघ मास शुरू हो रहा था उनका  विवाह उन  ब्राहमण युवकों  के साथ कर दिया , कन्या दान दुल्हे ने स्वयं किया |
पूस मास समाप्त होने पर जब आसिफ खान सुन्दरी व मुंदरी'     से निकाह करने के लिए आया तो उसे बताया गया की सुन्दरी व मुंदरी'  का तो विवाह हो चुका है तो वह हाथ मलता रह गया व मन मसोस कर वापिस लौट गया |
भारतीयों  ने इसे अपनी विजय के रूप में देखा और हर वर्ष इसे लोहड़ी त्यौहार के रूप में मनाया जाने लगा , यह परंपरा आज तक चली आ रही है |
लोहड़ी की आग, आप के सभी दुखों को जला दे...
और आप का जीवन सुखों से भर जाए.....
इस कामना के साथ...
पांच लिंकों का आनंद परिवार की ओर से...
आप सभी पाठकों व चर्चाकारों को पावन पर्व लोहड़ी की शुभकामनाएं...
कुछ कहानी शायद लंबी हो गयी...
अब पेश है आज के लिंक...


जरूरी है राष्ट्रवाद की भावना--L.S. Bisht
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 वैसे भी देश मे हो रहे आतंकी हमले बिना स्थानीय सहायता के संभव नही हैं । गत कई हमलों मे यह बात सामने भी आई है । वैसे भी समय समय पर दुश्मनों को महत्वपूर्ण सूचनाएं भेजने के आरोप मे कई लोग पकडे भी जाते रहे हैं । पहले पहल किसी मुस्लिम नाम के ब्यक्ति की बात् सामने आते ही पूरे देश मे एक अलग सी प्रतिक्रिया होती रही है लेकिन इधर कुछ राष्ट्रद्रोही मामलों मे ऐसे नाम भी सामने आए हैं जिनसे यह बात साफ हो चली है कि राष्ट्रविरोधी कार्यों का धर्मविशेष के लोगों से ही संबध नही है बल्कि लालच किसी को भी राष्ट्रद्रोही बना सकता है

अंतर्मन--Asha Saxena
द्वार के कपाट खुले
दर्द का अहसास जगा
धीमी न थी गति  उसकी
पूरी क्षमता से किया प्रहार
तन की सीमा पार कर गई
मन पर भी हावी हुई
सूनी सूनी आँखों से
 दे दी विदाई

Happy National Youth Day--Nitish Tiwary
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मंज़िल तो मिलेगी खुद ही सही,
रास्ता तो तुम्हे ही बनाना पड़ेगा,
पूरे होंगे अरमान सारे तेरे,
उम्मीद की किरण जगाना पड़ेगा।
राह में होंगे तेरे कई मुश्किल,
पर उनसे गुज़र कर जाना पड़ेगा,

यादों का कोलाज़...--प्रियंका गुप्ता   
बचपन में जब भी किसी भी अवसर पर मुझे ग्रीटिंग कॉर्ड्स मिला करते थे, मुझे उन्हें अपनी नज़रों के सामने रखना बहुत भाता था । जाने क्यों उन सबसे एक अपनेपन की खुश्बू सी आती थी । अब टेबिल या कमरे की अलमारी पर तो इक्का-दुक्का कॉर्ड ही जगह पा सकते थे न...? (और वैसे भी उस ज़माने में हम दो कमरों के किराये के मकान में हुआ करते थे ), तो फिर बाकी के कॉर्ड्स...? इसका एक बहुत बढ़िया हल निकाल लिया था मैने...एक मोटे कॉर्डबोर्ड पर उनका एक कोलाज़ जैसा बना लेती थी...। बाकायदा वेल्वेट

इस दीवानावार दुनिया में--Puja Upadhyay
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फिर भी उसे कभी कभी लगता था कि उसका हाथ कांप सकता है. उसने एक खूबसूरत किरदार लिखा. बेबी में अक्षय कुमार जैसा था. वैसा. सीक्रेट मिशन वाला. हँसते हुए उससे पूछा...कि तुम तो सोल्जर हो...तुम्हारे हाथ नहीं कांपेंगे न अगर गोली मार देने कहूँगी तो. किरदार उसका खुद का रचा हुआ था. शक की गुंजाइश ही कहाँ थी. लड़की सुकून में आ गयी. ख़ुशी का एक तागा उसकी उँगलियों पर भी बाँधा और कहा. वैसे किसी दिन भी खुश रहने का सोचना और मुझे गोली मत मारना. जिंदगी खूबसूरत है. खुशनुमा है. खुशफहम भले ही है मगर जीने लायक है.


अब अंत में...पढ़े...
वेदों के देश भारत में आयुर्वेद की दशा--ZEAL
७० के दशक के बाद से आयुर्वेद की लोकप्रियता विदेशों में बहुत बढ़ी है, वहां से विद्यार्थी इस पद्धति को सीखने निरंतर यहाँ आ रहे हैं, और अपने देश को समृद्ध कर रहे हैं , लेकिन अफ़सोस की हमारे अपने देश में इस वैदिक चिकित्सा पद्धति के प्रति जागरूकता बहुत कम है।

आज की हलचल
यहीं तक...
फिर मिलेंगे...


धन्यवाद।









  

3 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई कुलदीप जी
    अच्छी जानकारी दी आपने
    तिल गुड़ घ्या..गोड़-गोड़ बोला
    मकर संक्रान्ति की शुभकामनाएँ
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति हेतु आभार!
    सभी को लोहड़ी की हार्दिक शुभकामनाएं!

    उत्तर देंहटाएं
  3. यह गीत दुल्ला भट्टी "वाले" का नहीं, दुल्ला भट्टी का ही यशोगान करता है, जो पंजाब के पिंडी भट्टियां के शासकों, भट्टी सरदारों के खानदान का युवक था। वह एक दिलेर इंसान था जिसने ग़रीबों की सहायता के लिए अमीरों को तंग कर रखा था।

    उत्तर देंहटाएं

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