पाँच लिंकों का आनन्द

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रविवार, 29 नवंबर 2015

134...अब यह धर्मनिरपेक्षता क्या है

जय मां हाटेशवरी...

असहिष्णुता.....
असहिष्णुता
सड़क से लेकर संसद तक
गांव से लेकर शहरों तक
साहित्यकार  से लेकर अभिनेता तक
जिधर देखो उधर असहिष्णुता  की चर्चा...
पर मुझे नहीं लगता कि आज देश में किसी प्रकार की असहिष्णुता   है...
जिस सरकार को लक्ष्य कर आज हर तरफ असहिष्णुता   की चर्चा है... 
कहीं न कहीं उसके आदर्शों में श्री राम का आदर्श चरित्र और भारतीय गौरवमयी अतीत  ही बार-बार सामने आता है...
इसलिए राम-राज्य इस सरकार का   आदर्श माडल हो सकता  है...
रामचरितमानस में राम-राज्य के रूप में जिस राजतन्त्र का निरूपण किया गया है, उसमें जनतन्त्र का आदर्श रूप साकार हुआ है...
राम राजा बनते ही जनता को आत्म-निर्णय की खुली छूट देते हैं और उन्हें स्वतन्त्रता का पूर्ण बोध कराते हुए कहते हैं कि...
यहाँ तो कोई अनीति है और न मेरा कोई आधिपत्य या प्रभुत्व है, तुम सब अपने मन के अनुरूप कार्य करो...
यद्यपि यदि मैं कभी कोई अनीति की बात कहूं तो तुम निर्भीक होकर मुझे तत्काल रोक दो....
इस प्रकार प्राचीन भारत में शासन-व्यवस्था धर्मसम्मत थी। उस समय शासक और शासित धर्म-नीति से नियन्त्रित थे एवं उस युग में राजनीति मर्यादित थी। राजा राज-कर्म को ही राज-धर्म समझते
थे। हमारे वैदिक ऋषियों ने समतामूलक लोक- कल्याण-आधारित जीवन-दृष्टि से अभेदमूलक और ममतावादी सर्वोदयी शासन-पद्धति का विकास किया था, जिसे हम प्रजातन्त्र या लोकतन्त्र नाम से पुकारते हैं।
महात्मा गांधीजी ने इसी राम-राज्य को भारत के लिए आदर्श शासन-पद्धति माना था, किन्तु उनका वह सपना सच्चे अर्थों में साकार नहीं हो सका...
लोकतन्त्र में सहभागिता का माध्यम मतदान है, जिसके द्वारा जन स्वविवेक से अपने अधिकार का प्रयोग करता है। जो कि उसका अधिकार है।
जनता   ने सर्वमत से इस सरकार को चुन कर भेजा है...
इस लिये सरकार को स्वतंत्र  कार्य करने दें...
जिस दिन जनता  को लगेगा कि...
यह सरकार भारत की अखंडता के लिये खतरा है...
या किसी धर्म विशेष   की स्वतंत्रता खतरे में हैं...
उस दिन जनता स्वयं इसे बाहर  का रास्ता दिखाएगी...
साहित्य समाज का दर्पण होता है...
और साहित्यकार और अभिनेता युगप्रवर्तक  ...
अगर युगप्रवर्तक ही पक्षपाती हो जाए तो....

देश का माहौल  बेवजह  ही  बिगाड़ना प्रारंभ कर दे तो...
जनता किस पर भरोसा करेगी...


पेश है मेरे द्वारा प्रस्तुत आज की  पांच लिंकों मयी प्रस्तुति...
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मुझे जीने दो
रीता गुप्ता
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शीतल छांव ने उसे अतीत में पहुंचा दिया जब इस सड़क का निर्माण कार्य चल रहा था .
उस दिन घर से विजय बहुत लड़ कर आया था . उसकी पत्नी उम्मीदों से थी और गर्भ में लड़की होने की पुष्टि हो चुकी थी .माँ सहित सभी लोग उसे ख़तम करने की तयारी
कर चुके थे . उसकी नजर पड़ी , उबड़ - खाबड़ बंजर सड़क किनारे एक पीपल की दो नन्ही कोंपले कड़ी धूप में भी अपनी हरियाली दर्ज करा रही थी ,तभी एक बुलडोजर सड़क बनाने


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इतनी असहिष्णुता देश में कभी नहीं रही
हर्षवर्धन त्रिपाठी
कि आंकड़ों को 2014 और 2015 से पीछे ले जाएं, तो तस्वीर ज्यादा साफ होती है। 2010 में 701, 2011 में 580, 2012 में 668 और 2013 में 823 सांप्रदायिक हिंसा के मामले हुए थे। मई 2014 में यूपीए से सत्ता
हासिल करके एनडीए का शासन शुरू हुआ था। 
आंकड़ों इसका सीधा सा मतलब ये है कि नरेंद्र मोदी की सरकार के सत्ता में आने के बाद भारत को असहिष्णु बताने की जो जबर्दस्त कोशिश हो रही है। उसमें पक्षपाती
आंकड़ों का बबड़ा योगदान है। क्योंकि, इन आंकड़ों पर तो बात होती है कि देश में कुल कितनी घटनाएं हुईं। और उस समय केंद्र में किसकी सरकार थी। लेकिन, सच्चाई
ये भी है कि केंद्र में चाहे यूपीए की सरकार रही हो या फिर एनडीए की। कानून व्यवस्था राज्यों का ही मसला है। इसलिए कानून व्यवस्था के साथ सांप्रदायिक हिंसा पर बात करते हुए भी राज्यों की सरकारों पर बात किए बिना बात अधूरी ही रह जाती है। 

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इक ख्याल दिल में समाया है
राजीव कुमार झा
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इनसे दूर इंसान कहाँ मिलते हैं
बड़ी मुश्किल से इनसे निजात पाया है
परिंदों की तरह आसमां में घर बनाया है
साथ चलेंगी दूर तक ये हसरत थी
आंख खुली तो देखा अपना साया है


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वहाँ तुम थाम लेते हो
प्रवीण कुमार श्रीवास्तव
यहाँ जनता तुम्हारी मुश्किलों से ज़ंग लड़ती है,
वहाँ तुम मखमली बिस्तर लगा आराम लेते हो।
किसी ने ज़िन्दगी दे दी इमारत को बनाने में,
वहीं तुम मुफ़्त में तख़्ती लगा ईनाम लेते हो।


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और अब अंत में...
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अब यह धर्मनिरपेक्षता क्या है
संजय ग्रोवर
धर्मनिरपेक्ष शब्द तथाकथित प्रगतिशीलों और वामपंथियों में काफ़ी पसंद और इस्तेमाल किया जाता रहा है। मुझे यह और अजीब लगता है। क्योंकि वामपंथिओं को और उनके द्वारा
दूसरों को बताया जाता रहा है कि मार्क्स ने धर्म को अफ़ीम का नशा कहा है। यानि कि एक ख़तरनाक़ सामाजिक बुराई की तरह चिन्हित किया है। समझा जा सकता है कि मार्क्स
ने ऐसा किसी एक धर्म के बारे में तो कहा नहीं होगा। अगर धर्म की तुलना बुराई से की जा रही है तो वहां निरपेक्षता का क्या काम है !? या फिर ऐसी निरपेक्षता हमें
सभी बुराईयों के साथ बरतनी चाहिए। फिर एक गुंडई-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक बलात्कार-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक छेड़खानी-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक दंगा-निरपेक्षता
भी होनी चाहिए, एक लूटपाट-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक चोरी-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक शोषण-निरपेक्षता भी होनी चाहिए, एक वर्णव्यवस्था-निरपेक्षता भी होनी
चाहिए, एक ब्राहमणवाद-निरपेक्षता भी होनी चाहिए.......


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आज इस माह की मेरी  अंतिम प्रस्तुति
बस यहीं तक...
मिलते रहेंगे...
ईश्वर से कामना है...
 मेरे देश  में कभी...
असहिष्णुता न हो...
धन्यवाद।



6 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ फ्रभात
    सबसे पहले सहिष्णुता क्या है
    इसकी जानकारी आवश्यक है
    फि बाद में चर्चा असहिष्णुता पर
    सबसे पूछती ही हूूँ..इस नामुराद
    असहिष्णुता का शब्द किसके ज़ेहन मे आया
    यहाँ सब कुछ लिखने बैठूँगी तो
    दिन पूरा कम पड़ेगा
    ये शत प्रतिशत राजनीतिक उपज है
    शांत झील में कंकड़ फेकने जैसा
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति कुलदीप जी ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत सुंदर प्रस्तुति.
    मुझे भी शामिल करने के लिए आभार.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया हलचल प्रस्तुति
    आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  5. आदरणीय कुलदीप जी आपने मेरी कहानी "मुझे जीने दो शामिल किया " पर अधुरा ही पोस्ट किया ,अफ़सोस है .

    उत्तर देंहटाएं
    उत्तर
    1. रीता बहन
      सादर अभिवादन
      आपकी लिखी रचना का कुछ हिस्सा यहाँ पर है
      बाकी की रचना पसंद करने वाले
      आपके ब्लॉग पर जाकर पढ़ें इसकी व्यवस्था
      कर दी है हम लोगों नें
      ताकि आपके ब्लॉग को लोग देख सकें
      सादर
      यशोदा

      हटाएं

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