पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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रविवार, 8 नवंबर 2015

यह बताओ कि यह योगी पहले क्यों रोया, फिर क्यों हँसा?"---अंक 113

जय मां हाटेशवरी...


कलिंग देश में शोभावती नाम का एक नगर है। उसमें राजा प्रद्युम्न राज करता था। उसी नगरी में एक ब्राह्मण रहता था, जिसके देवसोम नाम का बड़ा ही योग्य पुत्र था।
जब देवसोम सोलह बरस का हुआ और सारी विद्याएँ सीख चुका तो एक दिन दुर्भाग्य से वह मर गया। बूढ़े माँ-बाप बड़े दु:खी हुए। चारों ओर शोक छा गया। जब लोग उसे लेकर
श्मशान में पहुँचे तो रोने-पीटने की आवाज़ सुनकर एक योगी अपनी कुटिया में से निकलकर आया। पहले तो वह खूब ज़ोर से रोया, फिर खूब हँसा, फिर योग-बल से अपना शरीर
छोड़ कर उस लड़के के शरीर में घुस गया। लड़का उठ खड़ा हुआ। उसे जीता देखकर सब बड़े खुश हुए।
वह लड़का वही तपस्या करने लगा।
इतना कहकर बेताल बोला, "राजन्, यह बताओ कि यह योगी पहले क्यों रोया, फिर क्यों हँसा?"
राजा ने कहा, "इसमें क्या बात है! वह रोया इसलिए कि जिस शरीर को उसके माँ-बाप ने पाला-पोसा और जिससे उसने बहुत-सी शिक्षाएँ प्राप्त कीं, उसे छोड़ रहा था। हँसा
इसलिए कि वह नये शरीर में प्रवेश करके और अधिक सिद्धियाँ प्राप्त कर सकेगा।"

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आज बिहार विधान सभा  चुनाव परिणामों पर हम सब की नजर है...
भाजपा का नारा था...
अपराध, अहंकार और भ्रष्टाचार,
 इस गठबंधन से कैसे बढ़ेगा बिहार...
जदयू का काउंटर अटैक देखिए...
बहुत हुआ जुमलों का वार,
 एक बार फिर नीतीश कुमार...
 राजद का नारा था...
न जुमलों वाली सरकार ही जुल्मी सरकार,
 गरीबों को चाहिए अपनी सरकार।...
 पर जंता को क्या चाहिये...
आज सब सामने आ जाएगा...
इस प्रतीक्षा की घड़ी में...
पढ़िये मेरे द्वारा प्रस्तुत ये प्यारे-प्यारे लिंक...


तुम संग मिलन कामना अर्चन से दोगुन
विरह तपस्या से भी होता है प्रिय चौगुन
प्रेम स्वर्ण का ज्यों तप के गल जाना !!
              मादक हो तुम.....................!!
लौहित अधर धर अधर धराधर मद धारा -
ज्यों पूनम निशि उभरे सागर का धारा
यूं उर -ओज की दमक मुख पर आना !!
मादक हो तुम मदिरालय फिर क्यों जाना



पुरस्कार लौटने वालों से मैं बस यही कहना चाहूंगा की क्या आपको पिछले डेढ़ सालों से ही असहिष्णुता महसूस हो रही है। और आप देश में खुली हवा में सांस नहीं ले
पा रहे हैं।  अगर ऐसा है तो जाकर ऑक्सीजन का सिलेंडर लीजिये ,आपको उसकी ज्यादा जरुरत है,आप बेहतर महसूस करेंगे। उस समय कहाँ थे आप जब कश्मीरी पंडितों पर ज़ुल्म
हुआ, जब भागलपुर में दंगे हुए, जब असम में खुलेआम कत्लेआम हो रहा था, जब मुज़्ज़फरनगर में फसाद हुआ और जब देश में आपातकाल लागू  हुआ था।  उस समय आपका आत्मसम्मान
तेल लेने गया था ? या आप बंद-कबाब खाने में व्यस्त थे?
और सोनिया मैडम मार्च निकालने  से पहले इतना तो सोची होती कि अगर देश में असहिष्णुता का माहौल होता तो इतने सालो से आपके विदेशी होते हुए भी देश ने आपको स्वीकार
न किया होता।  छत्तीसगढ़ में नक्सली हमले में शहीद हुए कांग्रेसी नेताओं के लिए आप रात के बारह बजे प्रेस कॉन्फ्रेंस करती हैं और मुझे बताइये की कितने शहीद सैनिको
के लिए कितनी बार आपने दुःख प्रकट किया। विपक्ष का मतलब हमेशा  विरोध नहीं होता है। देश के विकास में योगदान दीजिये मैडम और एक भारत श्रेष्ठ भारत के सपने को
साकार करने में मदद कीजिये।



कुछ दिनों से
कुछ अजीब सी
खुजली हो रही है
कुछ तार बेतार के
खुजली के खुजली से
भी तो जोड़ो जी
हो रही है तो हो रही है
खुजला रहे हैं बैठ कर
कहाँ हो रही है
क्यों हो रही है
सोचने समझने में
लग गये कलम ही
छूट गई हाथ से
क्यों छूटी कुछ सोचो
मनन करो हर बात
पर शेखचिल्ली का
चिल्ला तो मत फोड़ो जी




७ नवंबर 1858 को अविभाजित भारत के हबीबगंज जिले में [अब बांग्लादेश में] एक संपन्न घर में पैदा विपिनचंद्र पाल सार्वजनिक जीवन के अलावा अपने निजी जीवन में भी
अपने विचारों पर अमल करने वाले और स्थापित दकियानूसी मान्यताओं के खिलाफ थे। उन्होंने एक विधवा से विवाह किया था जो उस समय दुर्लभ बात थी। इसके लिए उन्हें अपने
परिवार से नाता तोड़ना पड़ा। लेकिन धुन के पक्के पाल ने दबावों के बावजूद कोई समझौता नहीं किया।

किसी के विचारों से असहमत होने पर वह उसे व्यक्त करने में पीछे नहीं रहते। यहां तक कि सहमत नहीं होने पर उन्होंने महात्मा गांधी के कुछ विचारों का भी विरोध
किया था। केशवचंद्र सेन, शिवनाथ शास्त्री जैसे नेताओं से प्रभावित पाल को अरविंद के खिलाफ गवाही देने से इनकार करने पर छह महीने की सजा हुई थी। इसके बाद भी
उन्होंने गवाही देने से इनकार कर दिया था। जीवन भर राष्ट्रहित के लिए काम करने वाले पाल का 20 मई 1932 को निधन हो गया|



       बहरहाल, रविवार को जो भी परिणाम आएगा, उसका सम्मान किया जाना चाहिए। बिहार चुनाव से हमें बहुत कुछ सीखना भी चाहिए। यह भारत की राजनीति के बेहतर भविष्य
के लिए जरूरी है। विकास के मुद्दे पर चुनाव प्रचार शुरू हुआ लेकिन जल्द ही जाति, धर्म और गाय पर आकर मामला अटक गया। हमें सोचना चाहिए कि आखिर हमारी राजनीतिक
अप्रोच क्या है? भारतीय राजनीति में ये ही मूल मुद्दे हैं क्या? जातिबंधन तोडऩे के लिए हम तैयार क्यों नहीं है? विकास की बात से भटक कर हम बार-बार सांप्रदायिकता
की ओर क्यों आ जाते हैं? बिहार चुनाव में जनता ने नेताओं की बदजुबानी भी देखी। समाज का नेतृत्व करने वाले नेताओं को संभलकर नहीं बोलना चाहिए क्या? उनके भाषणों
से जनता क्या सीखे? एक-दूसरे के खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग करना कितना उचित है? भारतीय राजनीति की यह दिशा ठीक नहीं है।
       यदि राजनीति इसी दिशा में आगे बढ़ती है तब कोई भी राजनीतिक दल जीते-हारे, जनता और लोकतंत्र हमेशा हारेंगे। देश के राजनीतिज्ञों, बुद्धिजीवियों और समाजसेवियों
को मिलकर विचार करना चाहिए कि राजनीति को ठीक करने के लिए क्या किया जाए? क्यों न जुमलों को छोड़कर मसलों पर बात हो? क्यों न जाति तोड़कर समरस समाज की चिंता
की जाए? क्यों न सांप्रदायिकता को राजनीति में घसीटना बंद किया जाए? चूंकि बिहार के चुनाव मदर ऑफ इलेक्शन हैं, इसलिए भारतीय राजनीति को यहां से सार्थक दिशा
मिलनी ही चाहिए।



आज बस
इतना ही...
धन्यवाद।

10 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई कुलदीप जी
    इस प्रस्तुति को देखकर
    पहले मैं भी रोई..
    फिर हँस पड़ी
    अपनी भुलक्कड़ आदत से
    बाज आओ भाई
    शानदार प्रस्तुति..
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. सुन्दर लिंक्स बधाई ................

    उत्तर देंहटाएं
  3. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति हेतु आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  4. bahut badhiya links...meri rachna shamil karne ke liye aapka dhanywaad.
    http://iwillrocknow.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  5. सुंदर रविवारीय अंक । आभार 'उलूक' का सूत्र 'नहीं दिखा कुछ दिन कहाँ गया
    पता चला खुजलाने गया है' को आज के पाँच में स्थान देने के लिये ।

    उत्तर देंहटाएं
  6. हार की खुशियाँ
    यह जो भारत है ना जब किसी को बिठाता है तो पलकों पर भी बिठा लेता है लेकिन जब पलकों पर बेठने वाला ही आँखों से छेड़खानी करे तो फिर पटकना भी बहुत अच्छी तरह जनता है
    यही आज बिहार मैं हुआ यह पहली बार हुआ है जब किसी के जीतने के ख़ुशी मनाने के बजाये किसी के हारने पर ज्यादा ख़ुशी मनाई जा रही है ....और ऐसा होना भी लाजमी था
    ऐसा इसलिए हुआ क्योंकि इस चुनाव के आक्रमक भाषणो मैं सब कुछ था गाय थी दादरी की घटना थी लेकिन बिहार नहीं था जिसका नतीजा सबके सामने है
    सच कहा जाये तो यह प्रधानमंत्री की ही हार है मोदी जी ने पूरी ताक़त जो लगाई थी उन्होंने और पूरी पार्टी ने मिलकर लगभग 900 रेलियाँ की और BJP के चाणक्य कहे जाने वाले अमित शाह पूरी तरह से बिहार में डटे रहने के बावजूद हार गए ....
    याद रखना चाहिए की हर बार विजय रथ का जुमला नहीं उछाला जा सकता .विकास भाषणो में नहीं
    असल में करके दिखाना पड़ता है ..जिस विकास का मुद्दा 2014 में उठाया गया था वो बिहार चुनाव आते आते धरातल तक पहुँच गया ..अमित शाह और उसके सिपहसलारों को बिहार के परिणामों ने बता दिया की मुस्लिमो का नाम लेकर हिन्दुओं का ध्रुवीकरण करने की कोशिशें कहीं भी सफल नहीं हो सकती
    सच है की बिहार में BJP की हार भारत के आने वाले भविष्य की राह तय करेगी .....

    वजीरों को भी तो रास्ता मालूम होना चाहिए “साहेब”
    सिर्फ काफिले ही तय नहीं करते सियासत की मंजिल

    उत्तर देंहटाएं

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