पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

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बुधवार, 4 नवंबर 2015

109 में... मेरी हंसी कभी भी किसी के दर्द की वजह नहीं होनी चाहिए...

जय मां हाटेशवरी...

मेरा दर्द किसी के लिए हंसने की वजह हो सकता है...
 पर मेरी हंसी कभी भी किसी के दर्द की वजह नहीं होनी चाहिए...
ये कहा था चार्ली चैपलिन ने...
आज के पांच लिंक क्या कह रहे हैं...
आप खुद पढ़ लिजिये...


तुम याद करो वीरांगन माँ, तुमने ही राम में राम धरा।
तुम ही कृष्ण-पार्थ रही, वसुधा का सारा पाप हरा।।
तेरी इच्छा से ही सम्भव माँ, शिवा, प्रताप से सिंह बने।
विक्रम, सम्राट अशोक रचे,
गुरू नानक सच्चे शेर बने।


होते हैं कुछ प्रश्न
नहीं जिनके उत्तर,
हैं कुछ रास्ते
नहीं जिनकी कोई मंजिल,
भटक रहा हूँ
ज़िंदगी के रेगिस्तान में
एक पल सुकून की तलाश में,
खो जायेगा वज़ूद
यहीं कहीं रेत में।


लेकिन आज
उम्र के साथ और भी गहरे में
बैठ गया है तुम्हारा प्यार
बेचैनी बढ़ जाने से
आँखें ज्यादा नमीदार हो गई है
हाँ इंतज़ार आज भी उतना ही है
मेरे तुम से मिलने का
क्योकि तुमने ही कहा था एक दिन
मुझसे पूरे होते हो तुम
और तुमसे मैं

जानते हैं सच्ची आवाज़ पहचानते हैं, उनके लिए अब यह डरना ज़रूरी होता जा रहा है। गीत-संगीत के नाम पर जो परोसा जा रहा है उसमें पंछियों की चहचहाहट नहीं है  बल्कि
सीमेंट-गारा बनाती मशीनों का शोर है। हमें तय करना होगा कि हमें क्या चुनना है ! जीवन के किसी भी मोड़ पर कभी-भी हम एक सीधा और सही सुर लगा पाएँ, यही रेशमा जैसे
मिट्टी से जुड़े कलाकारों को एक सच्ची श्रद्धांजलि होगी.             


तब बुढ़ापे ने सताया।
जब हुई कमजोर काया।
मौत का आया बुलावा।।
चक्र है आवागमन का।
जगत है जीवन-मरण का।।


आज के पांच लिंक तो  पूरे हुए...
चलते-चलते आनंद लेते हैं...
 श्रीवाल्मीकि निर्मित आर्ष रामायण आदिकाव्य के अयोध्याकाण्ड में अठारहवाँ सर्ग के अंतिम संवाद...
 आज के समय  में भी...
आदरणीय अनिता जी...
   अपने ब्लौग के माध्यम से...
श्रीवाल्मीकि निर्मित  रामायण को...
जन-जन तक पहुंचा रहे हैं
ये  मेरी दृष्टि से सब से उत्तम लेखन  है...

तुम त्यागो इस अभिषेक को, चीर, जटा धारण कर लो
कोसल की इस वसुधा का, जो पूर्ण रत्नों, अश्वों से
शासन करें भरत उसका, बस इतना ही माँगा मैंने
कष्ट सोच तुमसे वियोग का, करुणा से पीड़ित हैं राजा
साहस नहीं तुम्हें देख लें, मुख सूखा जाता है इनका
तुम आज्ञा का पालन करके, राजा को संकट से उबारो
सत्य की रक्षा हो इससे, दिए वचन का भी पालन हो
शोक नहीं हुआ राम को, कैकेयी के जब वचन सुने
किन्तु व्यथित हुए थे राजा, वियोगजनित दुःख के भय से

धन्यवाद।

8 टिप्‍पणियां:

  1. शुभ प्रभात भाई कुलदीप जी
    अच्छा चयन
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुंदर प्रस्तुति । सदस्यों का अर्धशतक होने पर बधाई भी ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. सुन्दर प्रस्तुती ...........

    http://meremankee.blogspot.in/

    उत्तर देंहटाएं
  4. सुप्रभात..पठनीय सूत्रों का पता देती पोस्ट..आभार !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बहुत सुंदर ।
    पोस्ट की लिंक शामिल करने के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  6. बहुत सुन्दर लिंक्स...आभार

    उत्तर देंहटाएं
  7. बहुत बढ़िया हलचल प्रस्तुति हेतु आभार!

    उत्तर देंहटाएं
  8. शुक्रिया कुलदीप जी, थोड़ा देरी हुई, बहुत बढ़िया चयन है आपका प्रयास बहुत अच्छा है, कोशिश करूंगी नियमित सभी को पढ़ सकूं।
    सादर
    शानू

    उत्तर देंहटाएं

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