पाँच लिंकों का आनन्द

पाँच लिंकों का आनन्द

आनन्द के साथ-साथ उत्साह भी है...अब आप के और हमारे सहयोग से प्रतिदिन सज रही है पांच लिंकों का आनन्द की हलचल..... पांच रचनाओं के चयन के लिये आप सब की नयी पुरानी श्रेष्ठ रचनाएं आमंत्रित हैं। आप चाहें तो आप अन्य किसी रचनाकार की श्रेष्ठ रचना की जानकारी भी हमे दे सकते हैं। अन्य रचनाकारों से भी हमारा निवेदन है कि आप भी यहां चर्चाकार बनकर सब को आनंदित करें.... इस के लिये आप केवल इस ब्लॉग पर दिये संपर्क प्रारूप का प्रयोग करें। इस आशा के साथ। हम सब संस्थापक पांच लिंकों का आनंद। धन्यवाद एक और निवेदन आप सभी से आदरपूर्वक अनुरोध है कि 'पांच लिंकों का आनंद' के अगले विशेषांक हेतु अपनी अथवा अपने पसंद के किसी भी रचनाकार की रचनाओं का लिंक हमें आगामी रविवार तक प्रेषित करें। आप हमें ई -मेल इस पते पर करें dhruvsinghvns@gmail.com तो आइये एक कारवां बनायें। एक मंच,सशक्त मंच ! सादर

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रविवार, 11 अक्तूबर 2015

हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है?---पृष्ठ 85

जय मां हाटेशवरी...

मैं इस बात पर जोर देता हूँ...
  मैं महत्त्वाकांक्षा , आशा और जीवन के प्रति आकर्षण से भरा हुआ हूँ....
 पर मैं ज़रुरत पड़ने पर ये सब त्याग सकता हूँ...
और वही सच्चा बलिदान है....
 भगत सिंह ने जो कहा...
समय आने पर वो करके भी दिखाया...
शत-शत नमन हैं आप की कुर्वानी को...
हर एक बात पे कहते हो तुम कि तू क्या है
तुम्हीं कहो कि ये अंदाज़-ए-गुफ़्तगू क्या है
न शोले में ये करिश्मा न बर्क़ में ये अदा
कोई बताओ कि वो शोखे-तुंदख़ू क्या है
ये रश्क है कि वो होता है हमसुख़न हमसे
वरना ख़ौफ़-ए-बदामोज़ी-ए-अदू क्या है
चिपक रहा है बदन पर लहू से पैराहन
हमारी ज़ेब को अब हाजत-ए-रफ़ू क्या है
जला है जिस्म जहाँ दिल भी जल गया होगा
कुरेदते हो जो अब राख जुस्तजू क्या है
रगों में दौड़ते फिरने के हम नहीं क़ायल
जब आँख ही से न टपका तो फिर लहू क्या है
वो चीज़ जिसके लिये हमको हो बहिश्त अज़ीज़
सिवाए बादा-ए-गुल्फ़ाम-ए-मुश्कबू क्या है
पियूँ शराब अगर ख़ुम भी देख लूँ दो चार
ये शीशा-ओ-क़दह-ओ-कूज़ा-ओ-सुबू क्या है
रही न ताक़त-ए-गुफ़्तार और अगर हो भी
तो किस उम्मीद पे कहिये के आरज़ू क्या है
बना है शह का मुसाहिब, फिरे है इतराता
वगर्ना शहर में "ग़ालिब" की आबरू क्या है

अब प्रस्तुत है आज की पांच लिंकों से सजी हलचल...

चावल के पहाड़ और दाल की नदी पर
कटे खीरा, टमाटर के फूल लगाना।
बहुत याद आता है बचपन दीवाना
सान कर दाल भात हाथों से खाना।


जहाँ से धूप आती है सवेरे-सवेरे
और कभी कभी बरसात भी वहां ठहर कर जाती है...
  याद है तुम्हें, उस आसमान में जो एक सुराख छोड़ा था कुछ साल पहले, उसके नीचे अब बहुत बड़ा जंगल उग आया है.... अलग-अलग तरह के दरख़्त है उसमे, कुछ फूलों की कोमल
पंखुड़ियाँ भी अठखेलियाँ करती हैं... सबके अलग-अलग रंग, अजीब अजीब सी खुशबू ... इसको अलग अलग छांट नहीं सकते, किसी की कोई अलग पहचान नहीं सब गडमड सा, सुहाना...
ये जंगल एकदम सपनों सरीखा है न, सपना ही तो है...  क्यूंकि हकीकत में आस-पास देखो तो अजीब ही माहौल है...


काम, क्रोध
लोभ, मोह, अहंकार
विकार हैं इस देह के
तो जब तक हम
स्वयं को
देह की बजाय
आत्मा नहीं मानते
छूट नहीं सकते
ये विकार ...!


क्या अजब जगह है
बिखरी पड़ी है
वेदना दुःख दर्द
जीवन मृत्यु के प्रश्न
इसी अस्पताल के
किसी वार्ड के बिस्तर पर


हाँ जी यह वही  फेसबुक है .... जिसने आम आदमी को भी आज खास बना दिया है, या यों कहे  कि सुपरस्टार बना दिया है . शुरू शुरू में चर्चा थी फेसबुक आया है, अमीरों
के चोचले ......कब आम जीवन की जरुरत बन गए किसी को भनक नहीं नहीं पड़ी . अकेले घर में बैठे बैठे लोग जहाँ अपने अड़ोसी पडोसी से कट गए वहीँ फेसबुक के जरिये पूरी
दुनियाँ से जुड़ गए हैं, कितना सच है कितना झूठ कोई नहीं जानता किन्तु झूठ का बड़ा सा मायाजाल ऐसा  फैला हुआ है जिसकी  चमक में सब धुंधला पड़ गया है. एक ऐसा नशा
जो सर चढ़ कर बोलता है .


अब अंत में एक सूचना...

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जारी किया गया.

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व्यवस्थापक
ब्लॉगसेतु ब्लॉग एग्रीगटर

धन्यवाद...

3 टिप्‍पणियां:

  1. वाह...
    क्या कहने...
    खूबसूरत प्रस्तुति
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. ब्लॉगसेतु ब्लॉग एग्रीगेटर का काम प्रशंसनीय और उल्लेखनीय है, जितनी भी प्रशंसा की जाय कम है ..
    बहुत बढ़िया जानकारी देती हलचल प्रस्तुति हेतु आभार!

    उत्तर देंहटाएं

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